नई दिल्लीः कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का प्रदर्शन लगातार जारी है. किसान दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर पिछले 3 महीनों से प्रदर्शन कर रहे हैं जिससे उत्तर प्रदेश और हरियाणा से दिल्ली आने वाले लोगों को भी काफी परेशानी झेलनी पड़ रही है. गुरुवार को भी हरियाणा और उत्तर प्रदेश से जुड़ी दिल्ली की सीमाओं पर गाड़ियों की आवाजाही बंद है.
दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने इन रास्तों से आने जाने वाले लोगों को डायवर्जन वाले रूट की जानकारी दी है. उत्तर प्रदेश से दिल्ली की ओर जाने वाले लोग गाजीपुर की सीमा को पार नहीं कर सकते हैं, इसलिए दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने उन्हें आनंद विहार, डीएनडी, लोनी और अप्सरा सीमाओं से होकर जाने की सलाह दी है. लोग चिल्ला सीमा वाले रास्ते का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. चिल्ला सीमा को कुछ समय तक ब्लॉक रखने के बाद जनवरी में खोल दिया गया था.
वहीं टिकरी, औचंदी, पियाउ मनियारीसबोली और मंगेश से गुजरने वाले दिल्ली और हरियाणा के बीच एंट्री और एक्जीट पॉइंट बंद हैं. ऐसे में ट्रैफिक पुलिस ने लोगों को लामपुर, सफियाबाद, पल्ला और सिंघू स्कूल टोल टैक्स बॉर्डर से गुजरने की सलाह दी है.पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के हजारों प्रदर्शनकारी किसान, लगभग तीन महीने से दिल्ली की सीमाओं पर इंतजार कर रहे हैं. प्रदर्शनकारी किसानों की मांग है कि नए कृषि कानून वापस लिए जाएं. सरकार का दावा है कि ये कृषि क्षेत्र में लंबे समय से लंबित सुधारों का हिस्सा हैं. हालांकि, किसानों की शिकायत है कि यह उन्हें कॉरपोरेट्स की दया पर डाल देगा.
इस बीच भारतीय किसान यूनियन ) के नेता राकेश टिकैत ने बुधवार को कहा कि अगर ट्रैक्टरों को रोका जाता है, तो किसानों के पास बैरिकेड्स तोड़ने की ताकत होनी चाहिए. टिकैत ने दिल्ली में चल रहे आंदोलन में शामिल होने के लिए आ रहे किसानों से यह बात कही. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, नागौर जिले के किसान महापंचायत को संबोधित करते हुए टिकैत ने कहा, “अगर आपको जानकारी मिलती है कि शहर में बैरिकेड हैं, तो आपके पास उन्हें हटाने के लिए पर्याप्त ताकत होनी चाहिए. ट्रैक्टर किसानों का टैंक हैं.”
टिकैत ने कहा कि अगर ये कृषि कानून लागू किए जाते हैं तो अन्न व्यापारियों और बड़ी कंपनियों के गोदामों में बंद कर दिए जाएंगे और अनाज की कीमत भूख के आधार पर तय की जाएगी. उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन खत्म नहीं हुआ है. टिकरी सीमा पर 15,000 ट्रैक्टर हैं और किसानों ने पेड़ों के नीचे झोपड़ियां बना रखी हैं.

