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…तो कर्ण की मंजूषा अधिरथ के हाथ नहीं लगती : मैं अंग हूं – 12

by bnnbharat.com
July 26, 2021
in भाषा और साहित्य, समाचार
…तो कर्ण की मंजूषा अधिरथ के हाथ नहीं लगती : मैं अंग हूं – 12
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कर्णगढ़ और गंगा… गंगा और कर्णगढ़… एक दूजे का पूरक… एक दूजे से अटूट रिश्ते में बंधे हुए। गंगा करीब बहती नहीं तो कर्ण की मंजूषा अधिरथ के हाथ नहीं लगती। तब कर्ण गढ़ के आबाद होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। लेकिन नहीं, कर्ण के अंगभूमि में आने मात्र से ही कर्णगढ़ का निर्माण हुआ, ऐसा नहीं माना जा सकता। सच तो यह है कि कर्ण गढ़ के निर्माण में परोक्ष तौर पर उस दुर्योधन का बड़ा योगदान रहा, जो निश्चित ही महाभारत का एक सम्मानित पात्र नहीं है। उसकी भूमिका का अंदाजा सिर्फ इसी एक बात से लगाया जा सकता है कि मंजूषा में बहते जिस बाल कर्ण को अंग की माटी ने दुलरायां पुचकारा और पाल-पोस कर बड़ा किया, उसे राजमुकुट पहनाकर अंगराज बनाने का महती कार्य सिर्फ और सिर्फ दुर्योधन ने किया।

तो क्या कर्ण की प्रतिमा को दो गज जमीन देने के लिये भी फिर किसी दुर्योधन को ही जन्म लेना पड़ेगा? अगर हां, तो कब ? कैसा होगा उस नये अवतरित होने वाले दुर्योधन का चेहरा ? लेकिन नहीं, आज के हालात में कर्ण की उपेक्षा तोड़ने के लिए किसी दुर्योधन को पुनर्जन्म लेने की जरूरत नहीं है। अतीत की चीर-फाड़ से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सत्ता या व्यवस्था ने कर्ण को भले ही बार-बार छला हो, अवाम तब भी उसके साथ रही, जब वह अंग नरेश थे।

अधिरथ को मिली थी कर्ण की मंजूषा

ऐसी बात नहीं होती तो महाभारत युद्ध में वीरगति प्राप्त करने के बाद लोग राजधानी चम्पा को ‘कर्णपू’ कहकर समवेत सलामी पेश नहीं करते। वहीं अवामी समर्थन आज भी कर्ण के साथ है, जो प्रतिमा स्थापित करने की दिशा में सतत् प्रयत्नशील है। यह दीगर बात है कि ऐसे प्रयत्न अब तक अपनी सार्थकता साबित नहीं कर पाये हैं, लेकिन इस सच्चाई से भी शायद ही कोई इनकार करे कि जैसे ही कर्ण की उपेक्षा से जुड़े अल्फाज कानों से टकराते हैं, अंगवासियों में अजीब सी उत्तेजना व्याप जाती है। जाहिर हो, कर्ण से जुड़ी किसी भी उपेक्षा पर अंगवासियों का उद्वेलित होना इसलिये लाजिमी है कि कर्ण के साथ इनका वही रिश्ता है, जो कर्ण कढ़ के साथ कर्ण का। यही नहीं, नाम आज भले ही बदल गया हो अंग का, अंगवासियों के अतीत ही नहीं, वर्तमान का नायक भी कर्ण ही है, जिनकी पहचान ‘राजा कर्ण’ से ज्यादा ‘दानी कर्ण’ के रूप में है, यानी एक ऐसा दानी जिसने दान के बदले प्रतिदान की अपेक्षा कभी नहीं की और जो दान देते वक्त याचक का चेहरा तक नहीं देखता था। तभी तो ये प्रश्न हवा में उछल रहे हैं कि अंग द्वारा एक उपेक्षित कर्ण को गढ़ने पर किसी को संदेह है क्या ? क्या यह भी सच नहीं है कि कर्ण ने पहले अंग, फिर आज के बिहार और कुल मिलाकर देश का मस्तक ऊंचा किया ? अपनी दान वीरता और बहादुरी से कर्ण ने जो इतिहास रचा, तबारीख को गौरवान्वित करने को क्या वह काफी नहीं है ?

क्रमश…

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