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मैं अंग हूं : अंगदेश की अपनी कुलदेवी थी – 13

by bnnbharat.com
July 27, 2021
in भाषा और साहित्य, समाचार
मैं अंग हूं : अंगदेश की अपनी कुलदेवी थी – 13
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कर्णगढ़ यानी कि कर्ण की नगरी की खोदाई में शृंगकालीन टेराकोटा की कई महत्वपूर्ण कलाकृतियां प्राप्त हुई हैं, जिनमें एक है खंडित नारी की प्रतिमा। उस प्रतिमा की विशेषता उसके शीर्ष के चारों ओर आठ अस्त्र-शस्त्रों का सजा होना है, जिसकी पहचान बायें से दायें क्रमशः कुल्हाड़ी, चक्र, शक्ति, गदा, वज्र, त्रिशूल, धनुष-वाण और अंकुश के रूप में की गयी है। वह प्रतिमा आज की देवी दुर्गा का आदि रूप उपस्थापित करती है। पुरातत्ववेत्ताओं ने इसे ‘चम्पा की मातृदेवी के रूप में स्वीकार किया है (‘ग्लोरीज आफ भागलपुर’) ।

इसका अर्थ है कि अंगदेश की अपनी कुलदेवी थी। कर्ण की उपासना भी आदिशक्ति से जुड़ी होने के प्रमाण मिलने से भी यह बात पुष्ट हो जाती है कि भले ही अंग अपने प्रारंभिक काल में शिवपूजक रहा हो, लेकिन शक्ति-पूजा का इतिहास भी खासा पुराना है इसका। मातृदेवी के रूप में पहचान की गयी मूर्तियों का खोदाई में प्राप्त होना भी इसी तथ्य की पुष्टि करता है। बाद को आदिशक्ति के उसी आदिरूप के आलोक में (आदिशक्ति) दुर्गा को अष्टभुजा और उन्हीं आठ अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित कर नये रूप की रचना की गयी।

इसी सच के मद्देनजर यह मान्यता यहां आम हुई कि आदिशक्ति ने सर्वप्रथम इसी भूखंड पर अंग धारण किया था। यह विभिन्न पुराविदों द्वारा व्यक्त विचारों के आलोक में डा. आरसी प्रसाद द्वारा निकाले गये इस निष्कर्ष से भी स्पष्ट हो जाता है कि “हिन्दुस्तान में अब तक हुई खोदाई में ‘चम्पा की मातृत्व’ जैसी आदिशक्ति की प्रतिमा अन्यत्र कहीं भी प्राप्त नहीं हुई है। आफ चम्पा एंड (आक्योलाजी) विक्रमशिला) ।

कर्णगढ़ की नाम मात्र के लिए हुई खोदाई में प्राप्त पुरावशेषों से इस बात के भी प्रमाण मिलते हैं कि अंगदेश के कलाकारों ने हाथी दांत पर भी अपनी फनकारी के नमूने पेश किये थे। हाथी दांत की बनी यह मूर्ति भी चम्पा की मातृ देवी के रूप में स्वीकार की गयी है, जिसकी उम्र पांचवीं-छठीं शताब्दी ईसा पूर्व आंकी गयी है। कर्णगढ़ की खुदाई कराने वाले डा. बीपी सिन्हा के अनुसार प्राचीनकाल की ऐसी ही काष्ठ प्रतिमाएं मिस्र और पश्चिम एशिया में प्राप्त हुई हैं। “

इसी आधार पर कुछ लोग हाथी दांत की बनी मातृ देवी की प्रतिमा को मिस्र और पश्चिम एशिया में प्रचलित काष्ठ कला की नकल बताते हैं। लेकिन जहां कला स्वयं नित्य जवान होती हो, हर किस्म की फनकारी की अपनी खासियत रही हो और संगतराशी में यहां के संगतराशों की कोई सानी न हो, वहां जन्म लेने वाली किसी कला को नकल बताने जैसी बात कुछ हजम नहीं होती। अगर कर्णगढ़ की विस्तृत खोदाई हो जाय और कर्ण का वह मंदिर निकल आये तो वहां स्थापित मातृदेवी की प्रतिमा के आधार पर किसी चौंकाने वाले निष्कर्ष के आकार ग्रहण करने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

क्रमशः…

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