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मैं अंग हूं : अंततः ऋषि को माननी पड़ी गणिका की बात – 5

by bnnbharat.com
July 20, 2021
in भाषा और साहित्य, समाचार
मैं अंग हूं : अंततः ऋषि को माननी पड़ी गणिका की बात – 5
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आश्रम के उस पवित्र वातावरण में सादगी और चालाकी के बीच एक जबर्दस्त प्रतियोगिता चल रही थी। एक तरफ रिझाने-बझाने में माहिर गणिका थी, तो दूसरी तरफ दुनिया के मायावी प्रपंचों से दूर ऋषि शृंगी।

गणिका के आश्रम में आने और जाने के बीच घटी घटनाओं को भूलकर श्रृंगी अब पूर्ण रुपेण साधना में लीन हो चुके थे। लेकिन एक लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर उसी जानी-पहचानी दैहिक खुशबू ने साधनारत शृंगी को विचलित कर दिया। आंखें खोलीं, तो सामने वही चिरपरिचित ‘मित्र’ खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसे देखते ही शृंगी सब कुछ भूल गये-अपने पिता विभांडक के क्रोध और निर्देश तक को भी। आसन से उठते हुए वह बोले-‘कहो मित्र, इतने दिनों तक कहां रहे?”

अपने नगर चला गया था मित्र लेकिन आपसे मिलने को बराबर बेचैन रहा। जैसे ही मौका मिला, आ गया’ जवाब में गणिका बोली। अच्छा किया जो पहले नहीं आए, वरना अनर्थ हो जाता पिताश्री का क्रोध तुम्हारा अस्तित्व मिटा डालता। तुम सही समय पर आये हो कि वह आश्रम में नहीं हैं, वरना.. ‘

‘वरना क्या मित्र ? मित्रता के नाम पर जान भी चली जाती तो मैं हंसते हंसते स्वीकार कर लेता। लेकिन मित्र! इस बार आपको साथ लिये बगैर मैं अपने नगर नहीं लौटूंगा।’

तुम्हार आग्रह मुझे स्वीकार है मित्र । मैं खुद ही तुम्हारा नगर देखने को इच्छुक हूं। लेकिन पिताजी का क्रोध…” वे जानेंगे तब न ! उनके आश्रम लौटने से पहले ही आप वापस लौट आयेंगे।’ ‘गणिका के इस जवाब पर भृंगी ने पूछा- ‘क्या ऐसा संभव है?’ ‘बिल्कुल संभव हैं। आपको साथ ले जाऊंगा तो समय पर आपकी वापसी सुनिश्चित करना भी मेरा दायित्व बनता है। आप बेफिक्र रहें। पिताश्री को पता भी नहीं चलेगा और आप मेरा नगर भी देखे लेंगे। अपने वाक चातुर्य से गणिका ने श्रृंगी की सादगी पर एक और प्रहार कर दिया।
जवाब से श्रृंगी संतुष्ट तो हुए, लेकिन एक आज्ञापालक पुत्र के मन में इसके बावजूद यह सवाल बार-बार उठता रहा कि पिता की स्वीकृति लिये बगैर इस प्रकार आश्रम से बाहर जाना क्या उचित होगा ? कहना गलत नहीं होगा कि आश्रम के उस पवित्र वातावरण में सादगी और चालाकी के बीच एक जबर्दस्त प्रतियोगिता चल रही थी। एक तरफ रिझाने-बझाने में माहिर गणिका थी, तो दूसरी तरफ दुनिया के मायावी प्रपंचों से दूर ऋषि शृंगी।

एक तरफ साधना की चट्टान थी, तो दूसरी तरफ यौवन और सौन्दर्य की उफनती धारा। एक तरफ चांद से निकलने वाली चांदनी की इंद्रधनुषी अंगड़ाई थी, तो दूसरी तरफ एक ऐसा चकोर, जो जीवन में शायद पहली बार ऐसी चांदनी का रस-पान कर रहा था। ‘और जैसा कि प्रायः ऐसे हालात में होता है, तर्क शास्त्र की पराजय और मनोविज्ञान की विजय हुई। पर ब्रह्म का वह उपासक बहरहाल, झटके में बोल पड़ा… ‘चलो मित्र, तुम्हारे नगर चलते हैं।’

क्रमशः…

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