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मैं अंग हूं : महाभारतकालीन सभ्यता का साक्षी है कर्णगढ़ – 11

by bnnbharat.com
July 25, 2021
in भाषा और साहित्य, समाचार
मैं अंग हूं : महाभारतकालीन सभ्यता का साक्षी है कर्णगढ़ – 11
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चम्पा-तट से थोड़ा हटकर आइये, अब चलते हैं उस कर्णगढ़ पर, जो महाभारत कालीन सभ्यता की साक्षी है। कोई नहीं जानता कि इसके सीने में कितने पौराणिक अवशेष दफन हैं। यही वह स्थल है, जहां कभी कुंती पुत्र कर्ण का किला आबाद था और अपनी दानवीरता के लिये जो विश्व प्रसिद्ध हुए थे।

जाहिर हो, मालिनी-चम्पा में राजा रोमपाद के बाद कर्ण अंगदेश के दूसरे प्रमुख और चर्चित शासक हुए और जैसा कि रोमपाद के नाम पर ‘मालिनी’ ‘रोमपादुपू’ नाम से पुकारी गयी, वैसे ही कर्ण के नाम पर चम्पा भी ‘कर्णपू’ के नाम से पुकारी गई, यानी दो अलग अलग कालखंडों-मालिनी और चम्पा के दो नायक रोमपाद और कर्ण।

रोमपाद का नाम तो बहुत कम लोगों की जुबानी सुना जाता है, लेकिन कर्ण आज भी यहां के जन-मन का सर्वस्वीकृत नायक हैं, जबकि कर्णगढ़ यादों का एक ऐसा खामोश मजार, जिसके गर्भ में परत-दर-परत इतिहास लिपटा है और बेजुबान होकर भी जो कर्ण की कथा बांच रहा है। कर्ण, यानी. महारथी और दानवीर साथ साथ, जिसे ‘दिनकर’ ने कहा ‘रश्मिरथी’ अर्थात सूर्य के वरदान से कुंती की कुंवारी कोख से जन्मा एक ऐसा शिशु,  जिसे सदा-सदा के लिए अपनी जननी के मातृत्व से वंचित रहना पड़ा। मातृत्व मिला उसे अधिरथ-पत्नी राधा से और ‘कौन्तेय’ बनते-बनते कर्ण बन गया “राधेय’ यानी अंग-पुत्र । लेकिन सूर्य पुत्र वह अंत-अंत कहलाता रहा। राजशक्ति के आगे नतमस्तक समाज ने भूत-पुत्र कहकर उसकी अवहेलना चाहे जितनी की हो, अंगराज बनने के बाद वही समाज दो कदम आगे बढ़कर उसके नाम का गुणगान करने में भी पीछे नहीं रहा। युग  बदला… हालात बदले… मान्यताएं बदलीं… विश्वास की जमीन कहीं दरकी तो नई तैयार भी हुई। नतीजे में वक्त की रेत पर अंकित कुछ निशान मिटे तो कुछ नये दर्ज भी हुए। लेकिन कणगढ़ पर दर्ज निशान के वक्ती बहाव भी न बहा ले जा सका, न मिटा सका।

गढ़ के साथ कर्ण का नाम जुड़ना अतीत की घटना है, लेकिन कर्ण के साथ गढ़ का रिश्ता वर्तमान की ऐसी सच्चाई है, जिसे ताजा करने की दिशा में हर कोई प्रयत्नशील और समर्पित है। इसलिये नहीं कि कर्ण उसका नायक है, बल्कि इसलिए कि कर्ण उपेक्षा से जूझने की प्रेरणा देता है।

उपेक्षा, जो आज के समाज की भी नियति है। वह कर्ण ही था, जिसने इस नियति को तोड़ा। लेकिन इस नियति से मुक्ति पाना आज मुमकिन है क्या ? विडम्बनाओं की उछल-कूद को रोक पाना क्या सच में मुश्किल नहीं है? शायद हां, क्योंकि इस कार्य के लिये किसी दुर्योधन को पुनर्जन्म लेना पड़ेगा।। लेकिन जहां ‘कृपाचार्यो’ और ‘प्रपंची इंद्रों की भीड़ लगी हो, नियति का शिकार होने की बाध्यता से आज का कोई ‘कर्ण’ मुक्ति पा ही नहीं सकता है क्यों ? इसका जवाब कल, इसलिये कि कुछ बातें ऐसी होती हैं, जो आज कहने की नहीं होतीं।

क्रमशः…

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