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मैं अंग हूं : शृंगी को राजसिंहासन पर देख ऋषि का वात्सल्य छलक पड़ा – 9

by bnnbharat.com
July 23, 2021
in भाषा और साहित्य, समाचार
मैं अंग हूं : शृंगी को राजसिंहासन पर देख ऋषि का वात्सल्य छलक पड़ा – 9
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लोगों और दरबारियों का अभिवादन स्वीकारते हुए ऋषि विभांडक जब राज भवन के दरबार हाल में पहुंचे तो मालिनी राजवंश के स्वर्णजड़ित राजसिंहासन पर अपने पुत्र शृंगी और उनके वाम पार्श्व में राजा रोमपाद की पोष्टा पुत्री शांता को D विराजमान देख उनका वात्सल्य छलक पड़ा और रहा-सहा क्रोध भी काफूर हो गया। तभी राजा रोमपाद ने कहा- ‘दोनों विवाह सूत्र में बंध चुके हैं। कृपया इन्हें अपना स्नेहाशीष प्रदान करें।’

विभांडक ने आशीर्वाद तो दिया, लेकिन साथ-साथ यह घोषणा भी कर दी कि शांता अब महर्षि शृंगी के साथ “आश्रम में रहेगी। ऋषि की उक्त घोषणा पर रोमपाद का चेहरा मुरझा गया। निःसंतान होने के चलते शृंगी को वे घरजंवाई बनाकर मालिनी का ‘उत्तराधिकार सौंपना चाहते थे, लेकिन ऋषि विभांडक की उस घोषणा से उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। बावजूद इसके उन्होंने ऋषि के समक्ष अपनी इच्छा खोल कर रख दी। अब गंभीर होने की बारी विभांडक की थी। काफी सोच-विचार के

बाद वह बोले ‘शृंगी पुत्र 66 कामेष्टि यज्ञ के विशेष है।

उस यज्ञ से राजा रोमपाद को पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी। इससे जहां मालिनी के सूने  सिंहासन को उत्तराधिकारी मिल जायेगा, वहीं भृंगी-शांता के आश्रम में रहने का द्वार भी खुल जायेगा और इस प्रकार ऋषि और राजा दोनों की मनोकामनाएं। एक साथ पूरी हो जायेंगी।”
तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक यज्ञ की तैयारी शुरू कर दी गयी। शुभ तिथि को शृंगी ने यज्ञ प्रारंभ कर दिया। यज्ञोपरांत राजा रोमपाद को ‘चतुरंग’ नाम का पुत्र हुआ और इस प्रकार मालिनी राजवंश की ठहर गयी वंशावली फिर से आगे बढ़ सकी। अपने मित्र रोमपाद को संतान प्राप्ति में मिली इस कामयाबी से प्रेरित हो अयोध्या नरेश दशरथ ने भी भृंगी-शांता को अयोध्या आमंत्रित किया, जहां उन्होंने उनके लिए भी उसी यज्ञ का आयोजन किया। परिणामस्वरूप अयोध्या की सूनी कोख भी हरी हो गयी। रामावतार की उस घटना से जहां वाल्मीकि को रामायण का नायक मिल गया, वहीं भारत को एक आदर्श और राम राजा के रूप में जिस सिद्धांत ने जन्म लिया, वही गांधी-दर्शन बन गया।

यही नहीं, इस अंगभूमि ने यह परंपरा भी कायम की कि एक ऋषि दाम्पत्य सूत्र में बंधकर आश्रम जीवन व्यतीत कर सकता है। इसका जप-तप पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। लेकिन इन तमाम उपलब्धियों को जन्म देने में उस गणिका की भूमिका अकेली और महत्वपूर्ण थी, जिसने जान जोखिम में डालकर अपनी मातृभूमि को गौरवान्वित करने वाली घटना को अंजाम दिया। समय की शिला पर वह अमिट लकीर की तरह वह आज भी दर्ज है। यही वजह है कि रामजन्म भूमि की चर्चा खुद-ब-खुद शृंगी, शांता और रोमपाद होती हुयी गणिका तक जा पहुंचती है।

क्रमशः…

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