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मैं अंग हूं : सम्मोहित श्रृंगी बढ़ चले थे गणिका के साथ – 6

by bnnbharat.com
July 20, 2021
in भाषा और साहित्य, समाचार
मैं अंग हूं : सम्मोहित श्रृंगी बढ़ चले थे गणिका के साथ – 6
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अब आगे-आगे गणिका थी और पीछे-पीछे श्रृंगी। दोनों आपस में वार्तालाप करते आगे बढ़ते चल जा रहे थे। गणिका की मंजिल तो ज्ञात थी, मगर शृंगी को कुछ पता नहीं था कि वह कहां जा रहे हैं। पता था कि सिर्फ यह कि अपने ‘मित्र’ के आग्रह पर वे उसका नगर देखने जा रहे हैं। कैसा होगा वह नगर, वनवासी श्रृंगी के मन में यह प्रश्न कौतूहल जरूर बार-बार उत्पन्न कर रहा था ।

आश्रम पीछे… बहुत पीछे छूट चुका था। ऊंची-नीची और पथरीली पहाड़िया अभी खत्म नहीं हुयी थी। पथ में पड़े नुकीले पत्थरों की चुभन से गणिका जब कभी लड़खड़ाती, पांवों में बंधे नूपुर की आवाज से आसपास का वातावरण सुरमैडित हो उठता। ऐसा लगता था_ मानों वे पांव नहीं, साक्षात वीणा हैं और नूपुर उसके तार जब कभी वह ‘वाद्य’ बजता, शृंगी उस सरगम को सपाट भाव से समझने की चेष्टा करने लगते। लेकिन हर प्रयास व्यर्थ । समझने की हर कोशिश नाकाम । एक सम्मोहित व्यक्ति की तरह शृंगी बस बढ़े चले जा रहे थे-साधना, आश्रम और पिता के क्रोध सबको भूलते हुए। गंतव्य था, चम्पा तट। मालिनी का राजमहल था उसकी नयी मंजिल, जहां पहुंचते ही कई कर्मकांड एक साथ संपादित होने वाले थे। संपूर्ण अंगभूमि अकाल से मुक्त हो जाने वाली थी तो भृंगी और शांता का पाणिग्रहण संस्कार भी संपन्न होने वाला था। काशी विश्वनाथ के शाप से मुक्ति का यही एकमात्र माध्यम था, साथ ही विभांडक के क्रोध से बचने का मार्ग भी ।

लेकिन शृंगी इन तमाम संभावनाओं से अनभिज्ञ थे। खुद गणिका भी सिंहासन द्वारा निर्धारित कार्यक्रमों से  बेखबर थी। उसे तो सिर्फ शृंगी को मालिनी तक ले आने की बात मालूम थी, जिसमें वह सफल हो चुकी थी।

बातों-बातों में ही आ गया वह नदी तट, जहां गणिका की सुसज्जित नौका पहले से तैयार खड़ी थी। पागल हिलोरें कठोर किनारे से टकरा-टकराकर लौट रही। थीं। लहरों पर लहरें… एक दूजे पर सवार लहरें… एक के बाद एक आतीब जाती जवान लहरें। लहरें उबलती अंगड़ाई लेने लगी, हर झोंके पर डगमगाती नौका कुछ ज्यादा ही सौन्दर्यवान हो उठी थी। हवा मंद-मंद चल रही थी। गणिका की दैहिक खुशबू घुलने से संपूर्ण वातावरण सुगंधित हो उठा था।

एक झटके के साथ गणिका पीछे मुड़ी। शृंगी पर नजरों का एक तीखा वाण फेंका। फिर शृंगी के घायल मन पर मुस्कान का मरहम लेपती हुई वह नौका में जा बैठी। नूपुर जोर से झंकृत हो उठे। मंत्रमुग्ध शृंगी भी नौका में सवार हो गये नौका की साज-सज्जा देख भृंगी प्रफुल्लित हो उठे। बोले यह नौका तो बहुत सुंदर है। वह कुछ और बोलते कि एक झटके के साथ नौका आगे बढ़ गयी और नदी की उठती गिरती लहरों के साथ नृत्य करती आगे बढ़ने लगी।

गणिका और ऋषि श्रृंगी मालिनी की ओर प्रस्थान

क्रमशः…

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