1. राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, ‘स्वामी प्रसाद मौर्य को 2017 विधानसभा चुनाव से पहले डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ही भाजपा में लेकर आए थे. केशव तब भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे और उन्होंने बड़े पैमाने पर गैर यादव ओबीसी नेताओं को पार्टी के साथ जोड़ने का काम किया था. हालांकि, जिस ताकत से स्वामी भाजपा में आए थे, उन्हें उतनी तवज्जो नहीं मिली.’
‘योगी कैबिनेट में स्वामी मंत्री तो बने, लेकिन विभाग काफी कमजोर मिला. इस बीच, केशव मौर्य भी डिप्टी सीएम तो बनाए गए, लेकिन योगी से उनके हमेशा मतभेद रहे. योगी और केशव के बीच की लड़ाई कई बार सामने आ चुकी है. ऐसे में स्वामी शिकायत भी किससे करते? यही कारण है कि कुछ नहीं तो यही सही मानकर स्वामी साढ़े चार साल मंत्री बने रहे. अब चुनाव नजदीक आते ही उन्होंने बदला ले लिया.’
2. पिछले साल नवंबर के आखिरी में एक मीडिया रिपोर्ट सामने आई थी. इसमें कहा गया था कि इस बार भाजपा अपने 100 से 150 विधायकों का टिकट काटने जा रही है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘भाजपा की नीतियां अन्य से बिल्कुल अलग हैं. यहां वही टिकेगा जो काम करेगा. जिन विधायकों ने काम नहीं किया है, उन्हें दोबारा मौका देने की जरूरत नहीं है.’
इस रिपोर्ट के आने के बाद से ही भाजपा के विधायकों में भगदड़ की स्थिति है. कई विधायक जिन्हें एहसास हो गया है कि इस बार उन्हें टिकट नहीं मिलेगा वह अपनी जमीन दूसरी जगह तलाश रहे हैं.
*राजभर ने किया था दावा*
समाजवादी पार्टी की सहयोगी पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने एक दिन पहले ही दावा किया था कि कई भाजपा के मंत्री और विधायक पार्टी छोड़ने का मन बना चुके हैं. चुनाव नजदीक आते ही एक-एक करके सभी पार्टी छोड़ देंगे. चर्चा यह भी है कि मंत्री धर्म सिंह सैनी समेत 12 से ज्यादा विधायक पार्टी छोड़ने की कतार में हैं. इन विधायकों के भाजपा से टिकट कटने के भी आसार ज्यादा है.
*सपा में क्यों जा रहे नेता?*
भाजपा और बसपा छोड़ने वाले ज्यादातर नेताओं ने समाजवादी पार्टी जॉइन की है. राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि इसका मुख्य कारण यह है कि इस बार का चुनाव भाजपा और सपा के बीच दिखाई दे रहा है.ऐसे में हर नेता अपना राजनीतिक लाभ लेने के लिए ऐसा कर रहा है.
*सपा को क्या फायदा मिलेगा?*
‘समाजवादी पार्टी ने इस बार चुनाव में एमवाई फैक्टर यानी मुस्लिम और यादव के फार्मूले को किनारे लगाकर भाजपा की रणनीति अपनाई है. 2017 चुनाव में भाजपा ने गैर यादव ओबीसी वोटर्स को केशव प्रसाद मौर्य के जरिए अपने पाले में किया था. जिन क्षेत्रों में बहुजन समाज पार्टी का प्रत्याशी मजबूत नहीं था, वहां दलित वोटर्स ने भी भाजपा का ही साथ दिया. इस बार समाजवादी पार्टी यही करने की कोशिश कर रही है. सपा के लिए यादव वोटर्स पक्के माने जाते हैं. ऐसे में अब उनका फोकस गैर यादव और ब्राह्मण वोटर्स पर है. सपा ठाकुर वोटर छोड़कर अपना फोकस ओबीसी और ब्राह्मण वोटर्स पर कर रही है.’

