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“मैं अंग हूं”: ऋषि के तप और गणिका के सौंदर्य के बीच छिड़ा था संग्राम – 2

यही मौका था योग पर भोग की एक और चोट करने का. आनंदातिरेक में डूबे श्रृंगी कह बैठे ' तुम्हारे पैरों से स्वर निकल रहे है'

by bnnbharat.com
December 14, 2022
in भाषा और साहित्य, समाचार
“मैं अंग हूं”: ऋषि के तप और गणिका के सौंदर्य के बीच छिड़ा था संग्राम – 2
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आश्रम के बाहर तो सबकुछ सामान्य-सामान्य था, लेकिन अंदर गणिका और ऋषि के बीच खामोश जंग चल रही थी. एक तरफ दुनियादारी छल-प्रपंचों से दूर ऋषि श्रृंगी और दूसरी तरफ प्रपंचों का चक्रव्यूह रचने में माहिर मालिनी की चतुर, सुंदर, चालाक नगर वधु. गणिका द्वारा दी गई मिठाईयां खाने के बाद बतौर धन्यवाद ज्ञापन श्रृंगी उसके केश-विन्यास की तारीफ करने लगे, जो खासे कलात्मक अंदाज में सिर्फ और सिर्फ अह्रींगी को लुभाने के मद्देनजर सजाए गए थे.

ऋषि की उस आत्मीयता ने गणिका का उत्साहवर्धन किया. लगे हाथ उसने साथ लाया मीठा पेय पदार्थ उन्हें थमा दिया, जिसे वे बेझिझक गटक गटगटा गये, अपनी नई मित्र का एक और मधुर अनोखा उपहार समझ कर. लेकिन उस पेय में नशा घुला था. लिहाजा पेट मे पहुचते ही उसने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. श्रृंगी की आंखें चढ़ने लगी और चंद लम्हा बाद ही मदहोशी उनके पोर-पोर से झांकने लगी. मौका गणिका के अनुकूल बनता जा रहा था. यही मौका था योग पर भोग की एक और चोट करने का. बिना कोई वक्त गंवाये उसने अपने रोमरहित सुडौल पैरों में नूपुर बांधा और नृत्य की छटा कुछ बिखेरने लगी मानो कोई मेनका किसी विश्वामित्र का तप भंग करने दूसरी बार अवतरित हुई हो.

नृत्य में जादू था, जिसके ठुमके पर आश्रम सुरमंडित हो उठा और मानो पेड़ भी झूमने लगे. कोयल की कूक और भौरों के गुंजन ने कुल मिलाकर वसंत से दृश्य रच दिया था. उधर, गणिका की एक-एक थिरकन पर नशे का सुरूर लम्हा दर लम्हा जवान होने लगा. नृत्य और सौंदर्य की उस जुगलबंदी में श्रृंगी अपना अतीत वर्तमान सब कुछ भुला बैठे और बन बैठे उस सजे, संवरे , रसभिने वातावरण के एक सहज सहयात्री, जबकि वहां कला और तपस्या के बीच संघर्ष चल रहा था.

आनंदातिरेक में डूबे श्रृंगी कह बैठे ‘ तुम्हारे पैरों से स्वर निकल रहे है’

नृत्य की तारीफ में निकली उस प्रतिक्रिया से गणिका को अगला कदम बढ़ाने को प्रेरित किया. बगैर कोई भूमिका बांधे वह बोली ‘ मेरे साथ हमारे राज्य चलने की कृपा करेंगे महर्षि आप?’

-‘चल सकता हूँ मगर जाने से पहले पिताश्री की आज्ञा जरूरी है’ श्रृंगी बोले.
-‘ आप स्थाई तौर पर थोड़े ही आश्रम छोड़ रहे है कि उनकी आज्ञा जरूरी हो’
-‘ नहीं मित्र, ऐसा कर पाना संभव नहीं है. मुझे यूं आश्रम अब गायब देख वो क्रोध में पागल हो उठेंगे.’

अभी यह मान मनव्वल चल ही रहा था कि गुप्तचरों की सूचना ने गणिका को सावधान कर दिया, क्योंकि आश्रम में अब किसी भी क्षण ऋषि विभांडक का आगमन हो सकता था. लिहाजा, आग्रह के सिलसिले में पूर्णविराम लगती हुई फिर मिलने के वायदे के साथ वह तेजी से नदी की ओर प्रस्थान कर गई. उधर नशे में धुत श्रृंगी उस मधुर क्षण की याद को मन ही मन गुनगुनाते हुए वहीं लुढ़क गये.. सबकुछ भूलकर.
याद रहा तो बस वो सौंदर्य और वह नृत्य, जो श्रृंगी के लिये सर्वथा एक कुंवारी अनुभूति थी.
(क्रमशः…)

राजेन्द्र प्रसाद सिंह द्वारा रचित
“मैं अंग हूं”

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