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रत्ती “एक चमत्कारी औषधि” : वनौषधि – 2

गुंजा/रत्ती/घुमची (वैज्ञानिक नाम Abrus precatorius)

प्रचलित नाम – रत्ती

प्रयोज्य अंग- मूल, पत्र तथा बीज

स्वरूप- बहुवर्षायु चक्रारोहीलता, संयुक्त पक्षाकार पत्ते, पुष्प श्वेत या गुलाबी रंग के, बीज चमकीले सिंदूर वर्ण या श्वेत रंग के काले दाग के साथ ।

स्वाद- तिक्त

रासायनिक संगठन- इसके बीज में ल्युपियोल ऐसीटेट, सिटोस्टीरोल, सुक्रोज़ गैलीक अम्ल, ओरीऐन्टीन, आइसोओरीएन्टीन, ऐबरूसिक अम्ल, हीमाग्लुटिनिन, इसके मूल में- स्टीग्मास्टीरोल, ग्लायसीन, ग्लुटामीक अम्ल, ऐस्पारटिक अम्ल, टायरोसीन, क्वेरसेटिन, ल्युटियोलिन, किम्फेरॉल, टेक्साल्बमिन, ऐल्के लॉयड ऐब्रीन, ग्लुकोसाईड-ऐब्रालिन, मोनोग्लुकोसीडीक ऐन्योसायनीन-ऐबरानीन, पत्रों में- प्रिकॉल, एबरॉल, ऐब्रासिन, प्रिकेसीन ।

गुण- अतिरेचक, वामक, बल्य, बाजीकर, उद्वेष्टहर ।

उपयोग में- वातिक, जांङ्गमविष, गर्भ निरोधक, जंतुघ्र, गर्भपात कराने में सक्षम, कृमिघ्न, शूलहर, कुष्ठन तथा पेशी विश्रामक, इसके पत्र- मुलेठी की तरह मधुर तथा कफ शामक, व्रण रोपण।

(1) इसके पत्र मिश्री के साथ चूसने से स्वरभंग में लाभकारी।

(2) वीर्य विकार में दो माशे मूल को दूध में पकाकर भोजन के पूर्व रात में देने से लाभ होता है ।

(3) श्वेत कुष्ठ में पत्र स्वरस चित्रक मूल में मिलाकर प्रयोग किया जाता है।

(4) गंजापन दूर करने के लिये रत्ती का चूर्ण जल में मिलाकर इसका लेप सिर पर बार-बार करने से बाल आ जाते हैं।

कण्डु एवं कुष्ठ रोगों में भृंगराज के रस में गुंजा का चूर्ण मिलाकर तेल सिद्ध करना चाहिये, इस तेल के प्रलेप से लाभ होता है।

गण्डमाल में गुंजाफल (500 ग्राम), गुंजामूल (500 ग्राम) के क्वाथ से सिद्ध किया हुआ तेल के नस्य एवं अभ्यंग से इस रोग का नाश होता है।

गृध्रसी में सायटिका नाड़ी पर गुंजाकल्क का लेप करना चाहिये, इससे वेदना नष्ट होती है।

नेत्र के तिमिर रोग में, शिरोरोगों में गुंजामूल स्वरस का नस्य देना चाहिए, इससे सभी प्रकार के शिरोरोग दूर हो जाते हैं ।

दंतकृमि में-गुंजा के ताजे मूल का प्रयोग दातून की तरह करने से दंत मूल में रहे कृमि नष्ट हो जाते हैं।

वाजीकरणार्थ- गुंजा फलों को दूध में पकाकर निस्तुप कर लेना चाहिए, फिर उसका चूर्ण बनाकर नियमित प्रातः सायं दूध के साथ सेवन करने से मनुष्य सशक्त होकर अच्छी तरह संभोग कर सकता है।

औषधोपयोगी कार्य में गुंजा (श्वेत) के बीजों का ही उपयोग करना चाहिए। कंठ

शोथ में गुंजा के हरित पत्र कंकोल के साथ चबाने से, इसका रस गले से नीचे उतारने पर स्वरभेद एवं कंठ शोथ में लाभ होता है।

मूत्र कृच्छ्र एवं रक्तपित्त में श्वेत गुंजा के पत्र, जीवन्ती के मूल, श्वेत जीरक एवं सिता के साथ मिलाकर चूर्ण बनाकर इसका सेवन करने से लाभ होता है ।

त्वक् रोगों में चित्रक के मूल के साथ गुंजा पत्र का कल्क बनाकर प्रयोग करने से लाभ होता है। गुंजा बीज का ताजा क्वाथ ही उपयोग करना चाहिए। गुंजा मूल का प्रवाही क्वाथ पुरानी खाँसी में अत्यंत लाभकारी है।

संधिवात की वेदना में-उस स्थान पर सरसों के उष्ण तेल में गुंजापत्र डुबोकर बांधने से बहुत ही लाभ होता है ।

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विष प्रभाव – बिना शोधन के बीज का प्रयोग वामक एवं विरेचक होता है। शोधन इसके बीज गाय के दूध में एक प्रहर उबालकर छिलके निकाल कर गरम पानी से धोकर प्रयोग करना चाहिये। मात्रा में मूल/पत्र चूर्ण- 1-5 ग्राम ,बीज चूर्ण-60-180 मिलीग्राम ।

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