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वीर कुंअर सिंह, जिन्होंने गोली लगने पर अपना हाथ काटकर गंगा में बहा दिया

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढे भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी. कवियों के मतानुसार, सुभद्रा कुमारी चौहान के द्वारा रचित इस वीर रास कविता में यहां पर बूढ़े भारत कहकर अंतिम मुगलिया सम्राट बहादुर शाह जफर की ओर इशारा किया गया है क्योंकि वह अशक्त हो चले थे, लेकिन क्रांतिकारियों के कहने पर अंग्रेजों के विरुद्ध ललकार जरूर भरी थी.

इतिहास क्रांति का केंद्र बहादुर शाह जफर को माने, लेकिन इससे पहले 1750 में तिलका मांझी क्रांति का बिगुल बजा चुके थे। फ़िलहाल लेकिन दिल्ली से बहुत दूर, गंगा नदी के तट पर गंगापुत्र भीष्म के ही समान एक और बूढ़ा अंग्रेजों की ओर नंगी तलवार लेकर दौड़ पड़ा था. घावों से भरे शरीर वाला वह 80 वर्षीय राजपूत जब जंगलों में युद्ध करता तो ऐसा लगता कि साक्षात भैरव तांडव कर रहें हों.

अंग्रेज सैनिके जिनके सामने टिक नहीं सके थे और जान बचाकर भागे थे ऐसे रणबांकुरे थे वीर कुंवर सिंह.

वीर कुंवर सिंह का जन्म 13 नवंबर 1777 को बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव में हुआ था. इनके पिता बाबू साहबजादा सिंह प्रसिद्ध शासक भोज के वंशजों में से थे. उनकी मां पंचरत्न कुंवर थीं. उनके छोटे भाई अमर सिंह, दयालु सिंह और राजपति सिंह एवं इसी खानदान के बाबू उदवंत सिंह, उमराव सिंह तथा गजराज सिंह नामी जागीरदार रहे.

बिहार का यह राजपूताना परिवार लंबे समय से अपनी स्वतंत्रता बचाकर रखा हुआ था. दादा-पिता भाई के बाद वीर कुंवर सिंह के हाथों जगदीशपुर रियासत की रक्षा थी.

27 अप्रैल, 1857 को आरा पर किया कब्जा

1857 में जब मेरठ, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, झांसी और दिल्ली में भी आग भड़क उठी थी. इस हाल में वीर कुंवर सिंह ने अपने सेनापति मैकु सिंह एवं भारतीय सैनिकों का नेतृत्व किया. वह युद्ध करते हुए आगे बढ़ रहे थे और रास्तें में अंग्रेज सैनिकों सिर बिछाते चल रहे थे. 27 अप्रैल, 1857 को दानापुर के सिपाहियों और अन्य साथियों के साथ उन्होंने आरा पर कब्जा जमा लिया.

जंगलों में हुई घमासान लड़ाई

इसके बाद अंग्रेजों की कई कोशिशों के बाद भी भोजपुर लंबे समय तक स्वतंत्र रहा. अंग्रेजी फौज आरा पर हमले के लिए आगे बढ़ी तो बीबीगंज और बिहियां के जंगलों में घमासान लड़ाई हुई. कुंवर सिंह भी छापामार युद्ध में प्रवीण थे.

अंग्रेजों को यहां भी मुंह की खानी पड़ी और कुंअर सिंह जगदीशपुर की ओर बढ़ गए. लेकिन अंग्रेजों ने आरा पर आखिर कब्जा कर ही लिया. अब उन्होंने जगदीशपुर पर आक्रमण कर दिया. कुंअर सिंह को वहां से निकलना पड़ा.

बांह काटकर गंगा को समर्पित कर दी

अंग्रेस सैनिक लगातार उनके पीछे थे. इस तरह वे बांदी, रीवा, आजमगढ़, बनारस, बलिया, गाजीपुर, गोरखपुर में अंग्रेजों को धूल चटाते रहे. भोजपुर और यूपी की सीमा पर पहुंचकर एक रोज वह गंगा पार कर रहे थे,

इसी दौरान अंग्रेजों की गोली उनकी बांह में लग गई. कुंअर सिंह ने तुरंत अपना हाथ काटकर गंगा में समर्पित कर दिया.

1857 में दिखाया अद्भुत रणकौशल

80 साल का यह बूढ़ा भैरव इच्छामृत्यु पाए भीष्म पितामह की तरह लड़ता रहा. कु्ंअर सिंह ने एक बार फिर हिम्मत जुटाई और जगदीशपुर स्थिति अपने किले को एक बार फिर अंग्रेजों से मुक्त करा लिया. रणबांकुरे ने जगदीशपुर किले से अंग्रेजों का ‘यूनियन जैक नाम का झंडा उतार कर ही दम लिया.

26 अप्रैल 1858 को कुंअर सिंह इस धरा विदा हुए. उनके रणकौशल को शत-शत नमन

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