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जानिए मुक्तवर्चा के औषधीय गुण : वनौषधि – 23

प्रचलित नाम – सुलतान (ताम्रपत्र एवं हरित पत्र) कुप्पी

प्रयोज्य अंग-पंचांग, पत्र, पुष्प ।
स्वरूप- लघु एक सदनी गुल्म,
पत्र भिन्न वर्णी (रक्त, हरित या ताम्र),
पुष्प मंजरीया लाल/ हरी ।

स्वाद- तिक्त ।

रासायनिक संगठन इस वनस्पति में किम्फेरॉल, ऐके लिफामाईड, क्वोनोन, स्टीरोल्स, सायनोजेनिक ग्लीसराईड्स घटक पाये जाते हैं ।

गुण- कफ नि:सारक, मृदुरेचक । उपयोग- इसके पुष्प-अतिसार में लाभकारी, पंचांग का प्रयोग रक्त निष्ठीवन, अमाशय तथा आंत्रशोथ, श्वासरोग, अस्थि भग्न दंतशूल तथा कर्णशूल में लाभकारी। इसके पत्रों को तमाकू के हरे पत्रों के साथ पीसकर चबाने से जीर्णकास-फेफड़ों से रक्तस्राव सहित के रोग में लाभकारी।
शिरशूल-हरितमञ्जरे पञ्चाङ्ग स्वरस का (1-2 बूँद) नस्य लेने से शीघ्र ही वेदना का शमन होता है।
दंतशूल-1 ग्राम हरितमञ्जरी चूर्ण में 1 ग्राम शुण्ठी को मिलाकर अच्छी तरह पीसकर दांतों के अंदर तथा बाहर लेप करने से दंतशूल का शमन होता है।
हरितमञ्जरी पत्र-क्वाथ का कवल एवं गण्डूष (गरारा) करने से दंतशूल का शमन होता है।
श्वास-5 मिली पञ्चाङ्ग स्वरस में 10 मिली शहद मिलाकर सेवन करने से श्वासनलिका-शोथ, श्वासकष्ट, कास, रक्तष्ठीवन एवं जीवाणु जन्य फुफ्फुस-शोथ में लाभ होता है।
विबन्ध-10-15 मिली पत्र क्वाथ में सेंधानमक मिलाकर सेवन करने से विबन्ध में लाभ होता है।
फिरंग-पत्तियों को पीसकर फिरंगज व्रणों में लगाने से फिरंग रोगजन्य व्रणों का शीघ्र शमन होता है।
आमवात-हरितमंजरी के पत्रों को पीसकर लगाने से आमवात में लाभ होता है।
पामा-इसकी पत्तियों को पीसकर लगाने से पामा, दग्धजन्य व्रण एवं अन्य त्वक् विकारों का शमन होता है।
व्रण-शुष्क पत्तियों के चूर्ण को सद्य क्षत एवं व्रण में डालने से व्रण जल्दी भर जाते हैं।
दद्रु-पत्र कल्क में नींबू स्वरस मिलाकर लगाने से दद्रु का शमन होता है।
क्षय-1 ग्राम हरितमञ्जरी पञ्चाङ्ग चूर्ण को शहद के साथ सेवन करने से क्षय रोग में लाभ होता है।
कृमिरोग-इसकी शुष्क पत्तियों का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली क्वाथ में लहसुन मिलाकर सेवन करने से आंत्रगत कृमियों का शमन होता है।
अग्निमंथ, मधूकसार, हरितमञ्जरी मूल, कूठ तथा लवण से निर्मित (1-2 ग्राम) चूर्ण में गोमूत्र मिलाकर सेवन करने से नासिका, पाद, शिर और ग्रीवा की संधि, हृदय तथा ऊरु में लेप करने से बिन्दुषट्क, बिल्ली तथा चूहे के विष का शमन होता है।
जांगम-विष-मूल को पीसकर सर्पदंश एवं वृश्चिक दंश एवं कीट दंश स्थान पर लगाने से दंशजन्य वेदना तथा क्षोभ का शमन होता है।

मुक्तवर्चा का पौधा

Acalypha hispida, Burm. EUPHORBIACEAE
ENGLISH NAME-Red Hot Cat-tail. Hindi-Kuppi

PARTS-USED– Wholeplant, Leaves, Flowers.

DESCRIPTION-A small monoecious herb with copper Red/Green Variegated leaves. Redish/Green Slender Spikes.

TASTE– Bitter.

CHEMICAL CONSTITUENTS- Plant Contains: Kaempferol, Acalyphamide, Quonone, Sterols, Cyanogenic glyceride

ACTIONS:- Expectorant Laxative.

USED-IN-Flowers: In Diarrhoea, Plant is used in Haemoptysis, Gastro-intestinal, Respiratory affections, Fractures, Toothache and Earache, Leaves Beatenup with Greentobaccoleaves are useful in Severe Cough associated withbleeding from Lungs.


अन्य नाम :-

संस्कृत-हरितमंजरी;
हिन्दी-मुक्तवर्चा, खोकिल, कुप्पी;
उड़िया-इन्द्रमरीस (Indramaris), नाकाचना (Nakachana);
कन्नड़-चलमरी (Chalmari), कप्पामेनी (Kappameni);
गुजराती-ददनो-वंछी-कांटों (Dadno-vanchhi-kanto);
तमिल-कुप्पामेनी (Kuppameni), पूनमयाक्की (Punmayakki), कुप्पामनी (Kuppamani);
तैलुगु-मुरीपीण्डी (Muripindi), कुप्पिन्टकु (Kuppintaku), मुर्काण्डचेट्टु (Murkandachettu);
बंगाली-मुक्ताझरी (Muktajari);
नेपाली-वर्षी झार (Varshi jhar);
मलयालम-कुप्पामेनी (Kuppameni);
मराठी-खजोटी (Khajoti), खोकला (Khokla)।

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