किशनगंज: किशनगंज को जिला बने 30 वर्ष बीत चुके हैं,लेकिन आज भी हमारा किशनगंज विकास से कोसों दूर है. किशनगंज का नाम देश के पिछड़े जिलों की सूची में स्वर्णिम अक्षरों रोशन होता आया है.
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आजादी के 73 साल बाद भी लगभग 17 लाख की आबादी वाले जिले किशनगंज में एक भी b.Ed कॉलेज का निर्माण नहीं हो पाया है.
यहां के छात्र आज भी B.Ed कॉलेज में दाखिला लेने हेतु दूसरे शहरों का रुख करते हैं. बिहार सरकार हर वर्ष बीएड में नामांकन के लिए B.Ed कंबाइंड इंट्रांस एग्जाम करवाती है और चयनित छात्र को दाखिला लेने के लिए बिहार में उपलब्ध बीएड कॉलेजों की सूची उपलब्ध कराती है,
आपको यह जानकर बुरा लगेगा कि इस सूची में किशनगंज का नाम दूर-दूर तक नहीं है या कह सकते हैं कि किशनगंज में आज तक एक भी B.Ed कॉलेज का निर्माण नहीं हुआ है.
शायद किशनगंज के राजनेताओं और बुद्धिजीवियों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यहां के छात्रों को बीएड की पढ़ाई करने के लिए दूसरे शहर का रुख करना पड़ता है, उनको तो फर्क इस बात से भी नहीं पड़ता है यहां लोग रोजगार के लिए भी दूसरे शहर की ओर पलायन करते हैं.
खैर हमारा आज का मुद्दा रोजगार नहीं बल्कि B.Ed कॉलेज है. यहां के छात्रों को प्यार मोहब्बत फेसबुक व्हाट्सएप टिक टॉक और पब्जी से फुर्सत मिल जाए तो शायद राजनेताओं से पूछ ही लेना चाहिए कि उन्हें जिले का पहला b.Ed कॉलेज कब मिल रहा है. क्योंकि B.Ed कॉलेज भी एक बहुत बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है वह निर्धारित करता है कि यहां के छात्र और छात्र नेता अपने राजनेताओं से इस विषय पर किस तरह से अपनी बात रखते हैं.
हम लोकतांत्रिक देश में रहते हैं जहां सवाल करना एक आम बात है, हमें अपने चुनिंदा सांसद और विधायक सवाल करने का पूरा हक है तो शायद हम हैं. इस मुद्दे पर भी उनसे बात करनी चाहिए. मैं यहां किसी राजनेता व राजनीतिक पार्टी को दोष नहीं दे रहा, दोष सिर्फ यहां के छात्रों का है जो खुशी खुशी दूसरे शहरों में जाकर B.Ed करते आए हैं.
बिहार सरकार द्वारा B.Ed करने का 2 वर्षों का शुल्क लगभग डेढ़ लाख निर्धारित किया है लेकिन यह शुल्क तब बोझ लगने लगता है जब हम अपने शहर को छोड़ B.Ed करने के लिए दूसरे शहर जाते हैं क्योंकि तभी college शुल्क के साथ साथ रहने, खाने और अन्य जरूरत की चीजों का शुल्क भी जुड़ जाता है तब डेढ़ लाख का B.Ed 3 लाख से ज्यादा पड़ जाते हैं.
हमारे जिले में कई ऐसे छात्र हैं जो गरीबी रेखा से नीचे आता है वह बड़ी मुश्किल से b.Ed कॉलेज का शुल्क ही जुटा पाता है ऐसे में अतिरिक्त शुल्क उसे और उसके परिवार को कर्ज के तले दबा देता है.
बात अगर सिर्फ बीएड करने का ही होता तो वह अपने शहर में डेढ़ लाख देकर बड़े आराम से अपने घर में रहकर और अपने घर का खा कर B.Ed कर सकता, लेकिन हमारे शहर में B.Ed कॉलेज ना होने के कारण हर B.Ed करने वाले छात्र को जो गरीबी रेखा से नीचे आते हैं उन्हें इस परेसानी का सामना करना पड़ता है.
आज भी बहुत से ऐसे छात्र हैं जो B.Ed (सीईटी) कॉमन इंट्रांस टेस्ट पास करने के बाद भी B.Ed नहीं कर सके क्योंकि किशनगंज में एक भी b.Ed कॉलेज मौजूद नहीं है, वह किसी तरह से B.Ed कॉलेज शुल्क का इंतजाम कर सकते थे.
इसके अतिरिक्त दूसरे शहर में रहने का खर्च उठाना मुश्किल हो जाता है. हम जानते हैं पिछले कुछ वर्षों में किशनगंज में विकास हुआ है लेकिन विकास की रफ्तार इतनी धीमी है की हम और विकसित शहरों से मुकाबला नहीं कर सकते हैं.
विकास की रफ्तार को तेज करने के लिए शिक्षा और यहां के लोगों को शिक्षित होना अति आवश्यक है, क्योंकि शिक्षा के बिना विकास होना असंभव है.
किशनगंज में शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने की जरूरत है क्योंकि यहां के अधिकतर परिवार गरीबी रेखा से नीचे आते हैं जो प्राइवेट स्कूलों का फीस भरने में सक्षम नहीं है उन्हें सरकारी स्कूलों पर है आश्रित रहना पड़ता है.
सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था तभी सुधरेगी जब उन्हें प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध करा सकेंगे, हम कह सकते हैं की जिले में b.Ed कॉलेज के निर्माण के बाद सरकारी स्कूलों के शिक्षा में सुधार आ सकता है.
जिले के दो प्रतिष्ठित महाविद्यालय मारवाड़ी कॉलेज और रतन काली साह महिला महाविद्यालय की भी शिक्षा व्यवस्था संतुष्ट नहीं है क्योंकि यहां शिक्षकों की कमी अक्सर देखी जा सकती है, इस बारे में किसी और दिन बात करनी है, हमारा आज का मुद्दा किशनगंज में बीएड कॉलेज की जरूरत को सबके सामने लाना था.

