रांची: भारत सरकार की ओर से 18 जून को शुरू होने जा रही नीलामी प्रक्रिया में झारखंड की 22 कोयला खदानें भी शामिल हैं. इन सभी के नीलाम होने पर झारखंड के खाते में कुल मिलाकर 90 हजार करोड़ रुपए आने की उम्मीद है.
यह राशि रॉयल्टी के अलवा खनिज विकास कोष में कपंनियों के अंशदान के रूप में मिलेगी. हर कोयला खान में खनन की अवधि 30 साल की होती है. इस तरह लगभग तीन हजार करोड़ रुपए हर साल झारखंड सरकार के खजाने में आएंगे. सभी 22 खदानों के नीलाम हो जाने पर लगभग 30 हजार लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की संभावना है. एक खदान में सभी स्तरों को मिलाकर लगभग 700 लोगों को नौकरी मिलती है. इस तरह 15 हजार लोगों को सीधी नौकरी की आशा है. इसी तरह 15 हजार लोगों को ट्रांसपोर्टेशन और बाकी आपूर्ति श्रृंखला में मिलेगा. इसके अलावा खदान में काम करने वालों की सहायक सेवाओं में भी रोजगार की संभावना है. खनन क्षेत्र के जानकारों का अनुमान है कि लगभग 15 हजार लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार भी मिल सकते हैं.
103 वर्ग किलोमीटर का इलाका होगा नीलाम
झारखंड की सभी 22 कोयला खदानें कुल मिलाकर 103 वर्ग किलोमीटर में है. उत्तर कर्णपुरा का नॉर्थ धाडू खदान 11.33 वर्ग किलोमीटर में है. इसी तरह लातेहार का औरंगा कोयला खदान 10.43 वर्ग किलोमीटर में है. प्रस्तावित नीलामी की सूची में ये दो सबसे बड़ी कोयला खदानें हैं. नॉर्थ धाडू में सबसे बड़ा कोयले का भंडार 923.94 मिलियन टन का है. राजमहल में दूसरा सबसे बड़ा कोयले का भंडार 679.30 मिलियन टन का है.
ऐसा है फायदे का गणित
सभी 22 कोयला खदानों में लगभग 386 करोड़ टन कोयले का भंडार है. एक टन कोयले के खनन से राज्य सरकार कोयले के खनन से सरकार को लगभग 225 रुपए मिलते हैं. यह राशि 86 हजार करोड़ रुपए से अधिक है. इसके अलावा कोल कंपनियों को खनिज विकास कोष में अपने मुनाफे का 26 फीसदी देना है. इसलिए 22 कोयला खदानों से झारखंड के खजाने में आने वाली कुल राशि 90 हजार करोड़ के पार होगी.

