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प्लास्टिक के खिलाफ एक परिवार ने छेड़ी मुहीम, पति और बच्चे मुफ्त बांटते हैं कपड़े के थैले

by bnnbharat.com
September 27, 2019
in समाचार
प्लास्टिक के खिलाफ एक परिवार ने छेड़ी मुहीम, पति और बच्चे मुफ्त बांटते हैं  कपड़े के थैले
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छत्तीसगढ़: क्या अपने कभी गौर किया है कि हर रोज़ आप प्लास्टिक से बनी कितनी चीज़ों का उपयोग करते हैं, टूथब्रश से सुबह ब्रश करना हो या ऑफिस में दिन भर कम्प्यूटर पर काम, बाज़ार से कोई सामान लाना हो या टिफिन और वॉटर बॉटल में खाना व पानी लेकर चलना प्लास्टिक हर जगह है, हर समय है. पॉलिथीन और प्लास्टिक गाँव से लेकर शहर तक लोगों की सेहत बिगाड़ रहे हैं. शहर का ड्रेनेज सिस्टम अक्सर पॉलिथीन से भरा मिलता है. इसके चलते नालियाँ और नाले जाम हो जाते हैं. हम सभी जानते है कि प्लास्टिक से होने वाली यह समस्याएं बेहद गम्भीर है, प्लास्टिक को पूरी तरह से खत्म होने में 500 से 1,000 साल तक लगते हैं लेकिन हम इस समस्या को ख़त्म करने के लिए क्या कर रहे हैं ?

प्लास्टिक एवं पॉलिथीन से होने वाले नुकसान को देखते हुए रायपुर के एक परिवार ने प्लास्टिक के खिलाफ जंग छेड़ी है. छत्तीसगढ़ के रायपुर में रहने वाले सुरेंद्र बैरागी और उनके परिवार ने शहर को प्लास्टिक मुक्त करने के लिए एक नेक पहल की शुरुआत की है. सुरेंद्र की पत्नी आशा पुराने कपड़े, चादर या फिर अनुपयोगी कपड़ों से थैला सिलने का कार्य करती हैं, वही सुरेंद्र अपने मित्रों और बच्चों के साथ इन थैलों को बाज़ार में बाँट देते हैं.

इस नेक कार्य की शुरुआत उन्होंने 15 अगस्त 2019 से की थी. सुरेंद्र बताते हैं, “हम दोनों पति-पत्नी टीवी देख रहे थे, प्रधानमंत्री ने इस दौरान लोगों से अपील करते हुए कहा कि वह पॉलिथिन का इस्तेमाल न करें और दुकानदारों से भी ऐसा ही करने को कहा. प्रधानमंत्री ने कहा कि आपको कपड़े के थैले का इस्तेमाल करना चाहिए. ”

प्रधानमंत्री की इस बात को सुनकर सुरेंद्र और उनकी पत्नी आशा ने निर्णय लिया कि वे अब शहर को प्लास्टिक मुक्त करने के लिए काम शुरू करेंगे. उसी दिन आशा ने 60 कपड़े के थैले बनाए और पास के सब्ज़ी बाज़ार में लोगों को बांट दिए.

उन्होंने थैले के साथ-साथ लोगों से हाथ जोड़कर अपील भी की, कि कृपा करके कपड़े से बना हुआ थैला उपयोग करे. इस दंपत्ति ने जब यह मुहिम शुरू की तब वे दोनों ही थे, लेकिन आज उनके साथ लगभग 30 लोग जुड़ गए हैं जो बिना किसी स्वार्थ के काम कर रहे हैं. सुरेंद्र एक सरिया बनाने वाली कम्पनी में काम करते हैं. उनको आस-पड़ोस, दोस्तों, रिश्तेदारों आदि से पुराने कपड़े मिल जाते हैं.

सुरेंद्र कहते हैं, “मुझे मालूम है कि मैं अकेले पूरे शहर को पॉलिथिन मुक्त नहीं कर सकता, लेकिन मैं अपने स्तर पर कुछ तो बेहतर करने का प्रयास कर ही सकता हूँ. ”

सुरेंद्र का मानना है कि हम सभी समाधान का हिस्सा बनें. हर शहर में लोग पॉलिथिन का उपयोग बंद कर दें, कोशिश करें कि हमारी आदत में बदलाव आए. जो ऐसे थैले बनाकर लोगों को वितरित कर सकते हैं, वह यह काम करें.

सुरेंद्र और उनका परिवार अब तक 1000 थैले बनाकर वितरित कर चुका है, इसके साथ-साथ हर रोज़ नए लोग इस मुहिम से जुड़ रहे हैं. उनकी योजना है कि आने वाले 2 महीने में तीन हज़ार थैले बांटे जाएंगे और आगे भी यह प्रयास जारी रखेंगे.

सुरेंद्र की पत्नी आशा कहती हैं, “जब देखती हूँ मेरे प्रतिदिन दो घंटे की मेहनत से कुछ लोग अपनी आदत को बदलकर पॉलिथिन का उपयोग बंद कर रहे हैं तो बहुत अच्छा लगता है. बहुत लोग कहते हैं कि तुम्हारे अकेले के थैला बनाने और बाँटने से क्या होगा, तो मैं कहती हूँ आप भी जुड़ जाइए हमारे साथ इस कार्य में तो हम अकेले नहीं रहेंगे. ”

इस मुहिम का असर भी दिखने लगा है, पास के बाज़ार में अब लोग कपड़े के थैले उपयोग करने लगे हैं. इसके साथ-साथ सब्ज़ी और फल बेचने वाले भी ग्राहकों को पॉलिथीन उपयोग करने के लिए मना करने लगे हैं. सुरेंद्र बताते हैं कि उनके दोस्त एवं पड़ोस के लोगों ने खुद तो पॉलिथिन का उपयोग बंद किया ही है और साथ ही दूसरों को भी प्रेरित कर रहे हैं.

निश्चित ही सुरेंद्र के इस प्रयास की सराहना होनी चाहिए, शासन-प्रशासन नियम बना सकते हैं किन्तु समाज को बेहतर बनाने के लिए एक आम आदमी को अपने ज़िम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाना चाहिए.

 

 

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