रिलिजियस आर्ट ने मानसिक अवसाद से उबरने में मदद की
रांची: कोरोना वायरस संक्रमण के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के कारण झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली नीतू हांसदा पूरी तरह से डिप्रेशन की शिकार हो गयी. इस बीच नीतू के परिजनों ने कई मनोचिकित्सकों और विशेषज्ञ डॉक्टरों से परामर्श लिया, पर उनकी मानसिक स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ, परंतु नीतू ने खुद के अंदर की शक्ति को एकत्रित कर ट्राइबल और साइकलोलॉजिक आर्ट की मदद से मानसिक अवसाद से उबरने में सफलता हासिल की. हुनर के बल पर इन्होंने अपने आप को डिप्रेशन से तो बाहर निकाला ही, पेंटिंग को कमाई का माध्यम भी बनाया.
सिविल सर्विस की तैयारी करने वाली नीतू हांसदा बताती है कि उनके जीवन में लॉकडाउन का अनुभव बेहद ही कड़वा अनुभव रहा है. सब कुछ लगभग ठप हो जाने से वह डिप्रेशन में चली गई थी. कई बड़ी प्रतियोगिता परीक्षाओं में वह 0.5प्रतिशत के अंतर से पिछड़ गयी, जबकि लॉकडाउन के कारण कई परीक्षाएं स्थगित हो गयी. जिसके कारण उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगा, कुछ पल के लिए उसे महसूस हुआ कि अब जीववन में कुछ बचा ही नहीं है.
अप्रैल से लेकर पूरे जून महीने तक वह मानसिक अवसाद से प्रभावित रही, लेकिन जुलाई के पहले सप्ताह से अंदर के हुनर को निकालते हुए नीतू ने खाली पड़े समय में रिलिजियस पेटिंग के साथ सोहराय, मधुबनी, वर्ली और मंडाला समेत 9 कलाओं में पेंटिंग करना शुरू किया. ट्राइबल और साइकोलॉजिक आर्ट के माध्यम से अब पूरी तरह से स्वस्थ हो चुकी है और डिप्रेशन के प्रभाव से बाहर निकल चुकी है.
अब वह अपनी पेटिंग को सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बेचने में जुटी है और इन पेटिंग के अच्छे दाम भी उसे मिल जाते है. इस तरह अब वे आर्थिक स्वावलंबन की राह पर चल पड़ी है. अब वह एक आर्ट स्कूल भी खोलना चाहती है ताकि बच्चों को भी प्रशिक्षित किया जा सके.
मुश्किल हालात से लड़ने में नीतू को अपनी मां शीतल हांसदा ,भाई सुमित और भाभी दीपिका के साथ- साथ समाज का भी भरपूर सहयोग मिला. मां शीतल हांसदा बताती है कि लॉकडाउन में परीक्षा नहीं लिख पाने के कारण उनकी बेटी पूरी तरह से डिप्रेशन में चली गयी, जिसके कारण पूरे परिवार के समक्ष मुश्किल उत्पन्न हो गयी.
वहीं भाई सुमित और भाभी दीपिका ने भी इस संकट की घड़ी में नीतू का पूरा साथ किया. भाई ने पेटिंग के लिए हर जरुरी सामान को उपलब्ध कराया, वहीं भाभी ने एक दोस्त की भांति नीतू की क्रिएटिविटी को बढ़ाने में सहयोग किया. वहीं छोटी सी उम्र में समय के कई दौर से गुज़र चुकी नीतू हांसदा अब पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहती. कैनवास पर रंग भरने वाली नीतू अब आत्मनिर्भर भारत अभियान की हिस्सा बन चुकी है.

