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प्रवासियों में है लोकल को वोकल बनाने का दम 

by bnnbharat.com
May 27, 2020
in समाचार
प्रवासियों में है लोकल को वोकल बनाने का दम 
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प्रवासी नाम सुनते ही जेहन में एक ही दृश्य आता है ,वें हजारों – लाखों लोग जो बिना कुछ सोच विचार के पैदल ही अपने घरों के लिए निकल पड़े हैं। सर पर भारी बैग, हाथों में अपने बच्चों को लिए और उससे भी भारी बोझ अपने कंधों पर उठाये -अपने परिवार को सकुशल घर पहुंचाने की .

बस निकल पड़े हैं मिलों की दूरी के अभिमान को अपने नंगे पैरों से चूर करने को. पर क्या यह मात्र एक भीड़ है जो जीवन यापन के लिए अपने घरों ,खेत- खलिहानों को छोड़ परदेस जा बसे, या एक वर्ग जो कोरोना महामारी के इस जंग में राज्य सरकारों का सरदर्द बना हुआ है.

कोरोना महामारी से हुए लॉक डाउन के चलते अगर कोई सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है तो वह है दिहाड़ी मजदूर.

लॉक डाउन ने इन मजदूरों से न सिर्फ इनके रोजी रोजगार छीने बल्कि इनके माथे से छत और खाने के निवाले भी छीन लिए है.

कोई सड़कों पर सोने को मजबूर है तो कोई दूसरों के द्वारा दिए पैकेट्स पर अपना दिन गुजार रहे.

परिणामस्वरुप लाखों मजदूर अपने घरों को लौटने को मजबूर है . कुछ इस उम्मीद में कि अब वहीं रहकर जीवन जीने की कोशिश करेंगे, तो कुछ इस आस में कि लॉक डाउन के खत्म होने के बाद स्थिति पहले की तरह सामान्य हो जाएगी और वें फिर से अपने कामों में लग सकेंगे.

पर जहां सरकार इन्हें अपने सर का बोझ, कोरोना संक्रमण के संचार स्रोत समझ कर इन्हें राज्यों में प्रवेश से रोक रही है. वहीं सरकारों को इन्हें एक अवसर की तरह  देखना चाहिए .

यह वही श्रम शक्ति है जिनमें मिट्टी से ईट और ईट से भवन बनाने की क्षमता है. इन प्रवासियों में हजारों ऐसे दशरथ मांझी छिपे है जो पहाड़ काटकर रास्ता बना सकते ,भूमिगत जल को पानी की टंकियों तक पहुंचा सकते और अपनी श्रम शक्ति के दम पर ही अपने बीमार पिता को साइकिल पर बिठा 1200 किलोमीटर की दूरी तय कर सकती.

यूपी, बिहार जैसे राज्य जहां गरीबी व रोजगार के अवसर न होने से लाखों लोगों को दूसरे राज्यों में पलायन करना पड़ता ,उन राज्यों को इन सस्ते व कुशल श्रमिकों को अपने ही राज्य में रोजगार देने के लिए अवसर प्रदान करने की तलाश करनी चाहिए .

झारखंड जैसे राज्य जहां लाह, तसर, गोंद की बहुतायत में उत्पादन होती उन्हें यदि इन श्रमिकों के कुशल हाथों में दे दिया जाए तो यह ना सिर्फ उनकी उत्पादन क्षमता बढ़ा सकते बल्कि ग्लोबल लेवल पर इसकी मार्केटिंग भी कर सकते.

राज्य सरकारों को इस ओर पहल करने की आवश्यकता है जिससे ना सिर्फ इन मजदूरों को उनके घरों पर ही रोजगार के बेहतर अवसर मिलेंगे बल्कि लोकल संसाधनों के बेहतर उपयोग से राज्य की अर्थव्यवस्था में भी सुधार आ सकती.

 

लेखिका:- सोनाली सिंह

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