नई दिल्ली: लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात रखने का हक है. पर CRPF के जवान शायद इसमें नहीं आते. केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के कॉडर अधिकारियों और आईपीएस IPS अफसरों के बीच चल रहे प्रमोशन एवं वित्तीय मामलों को लेकर तनातनी बढ़ती जा रही है. CRPF मुख्यालय ने अपने ही 12 अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी है. कई दूसरे अफसरों के खिलाफ भी जांच होने की बात सामने आई है. इस कार्रवाई के पीछे यह तर्क दिया गया है कि अर्धसैनिक बलों के अफसर नियमों से परे सोशल मीडिया में अपनी बात रख रहे हैं. सीआरपीएफ के रिटायर्ड अफसरों ने इस कार्रवाई को निंदनीय बताया है.
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद केंद्र सरकार कॉडर अफसरों को इनका हक नहीं दे रही है. प्रमोशन के स्तर पर ये अधिकारी 15 साल पीछे चल रहे हैं. कॉडर अफसरों को अपनी बात रखने के लिए आगे नहीं आने दिया जाता. इस मामले में बातचीत के लिए जब बुलाया जाता है, तो वहां गृह मंत्रालय यह शर्त रख देता है कि बैठक में एडीजी रैंक से नीचे के अधिकारी न हों .
‘आईपीएस बनाम कॉडर अफसर’ विवाद क्या है
विभिन्न अर्धसैनिक बलों के करीब दस हजार कॉडर अफसर अपने प्रमोशन को लेकर परेशान हैं. इनमें सहायक कमांडेंट से लेकर आईजी रैंक तक के अधिकारी शामिल हैं. जिस तरह से केंद्र सरकार की दूसरी संगठित सेवाओं में एक तय समय के बाद रैंक या फिर उसके समकक्ष वेतन मिलता है, वैसा सभी केंद्रीय सुरक्षा बलों के अधिकारियों को नहीं मिल पा रहा है. करीब बीस साल की सेवा के बाद आईपीएस अधिकारी आईजी बन जाता है, लेकिन कॉडर अफसर उस वक्त कमांडेंट के पद तक पहुंच पाता है. कॉडर अफसर 33 साल की नौकरी के बाद बड़ी मुश्किल से आईजी बनता है.
DOTP ने दिया था आदेश
डीओपीटी ने 2008-09 के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों में ओजीएएस यानी ‘आर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस’ के तहत सेवा नियम बनाने के आदेश जारी किए थे. अभी तक सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ और दूसरी कई सेवाओं में सर्विस रूल्स नहीं बनाए गए हैं. इतना ही नहीं, इन कॉडर अधिकारियों को समय पर गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू) और गैर-कार्यात्मक चयन ग्रेड (एनएफएसयू) का लाभ मिल जाए, इसके लिए आरआर यानी रिक्रूटमेंट रूल में भी संशोधन नहीं किया गया. इस वजह से आज बहुत से कॉडर अधिकारी परमोशन और आर्थिक फायदों से वंचित हैं.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना
सीआरपीएफ के रिटायर्ड आईजी वीपीएस पवार और एसएस संधू जैसे कई अधिकारियों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2019 में कॉडर अफसरों के पक्ष में फैसला सुनाया था. अब साल बीतने वाला है, लेकिन फैसला अभी तक लागू नहीं हुआ. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पहले 31 जुलाई तक का समय मांगा था. उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में यह कह कर कि इस मामले में काम हो रहा है, 30 सितंबर तक का वक्त ले लिया. इसके बावजूद कॉडर अफसरों को कुछ नहीं मिला.
पता चला कि सरकार ने फिर से अदालत से 30 नवंबर का वक्त मांगा लेकिन वह तारीख भी निकल गई. सरकार ने अब सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि हमने अधिकांश काम पूरा कर लिया है. चूंकि यह जटिल मामला है, हर अफसर का अलग से रिकॉर्ड चेक हो रहा है, इसलिए कहीं कोई चूक न हो, 31 मार्च 2020 तक का समय दे दिया जाए.
सरकार पर आईपीएस लॉबी का दबाव
रिटायर्ड अफसरों का कहना है कि सरकार आईपीएस लॉबी के दबाव में है. इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने में टालमटोल हो रहा है. जो अफसर सोशल मीडिया में अपनी बात रख रहा है, उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा रही है. एक तरफ सरकार कुछ देने की बात कहती है, तो दूसरी ओर युवा अफसरों को परेशान करने के लिए उनके खिलाफ उल्लंघन बता कर कार्रवाई कर रही है.
नए सर्विस रूल्स बनाने की बात
विभिन्न अर्धसैनिक बलों में तैनात हजारों कॉडर अफसर वेतन विसंगतियां खत्म कराने और समय पर पदोन्नति के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं. दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी इनके पक्ष में फैसला दे दिया है. अदालत के फैसले से हरकत में आई केंद्र सरकार ने कुछ समय पहले ही यह घोषणा कर दी कि इन अधिकारियों को संगठित कॉडर के सभी फायदे मिलेंगे. यानी अब इन अफसरों को एनएफएफयू और एनएफएसयू का लाभ मिल जाएगा.
सरकार ने इन्हें संगठित कॉडर सेवा के सभी फायदे देने की घोषणा तो कर दी, लेकिन उसके लिए डीओपीटी के आदेशों का पालन नहीं किया गया. डीओपीटी ने केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के कॉडर अफसरों के लिए नए सर्विस रूल बनाने की बात कही थी. केंद्र सरकार ने इस दिशा में कोई काम ही नहीं किया.
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