रांची: बहुत कम लोगों को पता होगा की माता सीता को वनवास के आरम्भ में दिव्य वस्त्र प्रदान किया गया था जो न कभी फट सकते थे न कभी मलिन होते थे.
वनवास के प्रारम्भ में जब राम, लक्ष्म और माता सीता ऋषि अत्रि के आश्रम में पहुंचे तो ऋषि ने राम और सीता दोनों की पूजा वंदना की पर जब सीता जी अंदर सती अनुसूइया से मिलने गई तब सीता जी ने अनुसूइया को प्रणाम किया.
फिर सीता को अपनी बेटी जैसा प्यार देते हुए माता अनुसूइया ने दिव्य वस्त्र पहनाए. इसके बाद सीता को पत्नी धर्म का भी उपदेश दिया.
यह दिव्य वस्त्र था वह न तो फट सकते था, न ही मलिन हो सकते था अर्थात उसमें नित्य नूतन रहने की शक्ति थी.
स्रोत : रामायण

