रांची: चालू खरीफ मौसम में अच्छी बारिश होने से प्रदेश में मुख्य फसल धान सहित सभी फसलों की स्थिति काफी अच्छी है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, फसल स्थिति को देखते हुए किसानों को खेतों में लगी फसलों के प्रति विशेष सावधानी की जरूरत है. इस मौसम में जरा सी भी लापरवाही से फसलों को कीट एवं रोगों की चपेट में आने की संभावना है, जो किसानों की सारी मेहनत पर पानी फेर सकता है.
बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को अगले कुछ दिनों में कीट एवं रोगों से फसल/सब्जियों के बचाव के लिए साफ मौसम को देखते हुए दवा का छिड़काव/भुरकाव करने की सलाह दी है.
मुख्य वैज्ञानिक (कीट) डॉ पीके सिंह ने भूट्टे में लग रहे दाने के बचाव हेतु मकई खेत की रखवाली तथा कीट आक्रमण से बचाव के लिए खेतों में खंभों के सहारे चमकीले तार को बांधने को कहा है. इस तार को देखकर पक्षी दूर भागते हैं. उन्होंने मकई फसल पर फलभेदक कीट का आक्रमण दिखने पर नीम से बनी कीटनाशी दवा का छिड़काव 2-3 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से पौधे के ऊपरी भाग पर करने की सलाह दी है.
वैज्ञानिकों ने कहा कि मुख्य फसल धान का पुष्पावस्था में समुचित देखभाल करने की जरूरत है. इस अवस्था में गंधीबग कीट के आक्रमण की संभावना बनी रहती है. जो फूलों के रस को चूस लेता है, जिससे दाने नहीं बन पाते हैं. गंधीबग कीटों का आक्रमण होने पर कीटनाशी दवा क्लोरोपाइरीफास/क्विंनालफास/मिथाइल पाराथियान धूल का भुरकाव 10 किलो ग्राम प्रति एकड़ की दर से साफ मौसम देखते करना चाहिए.
कीटनाशी दवा के भुरकाव के बाद ये कीड़े बगल वाले खेतों में चले जाते हैं. इसलिए किसानों को एक साथ अलग-अलग खेतों में दवा का भुरकाव करना चाहिए. कीटनाशी दवा के अभाव में राख में मिट्टी (किरासन) तेल मिलाकर खड़ी फसल में भुरकाव किया जा सकता है.
कनीय वैज्ञानिक (पौध रोग) डॉ एमके वर्णवाल ने बताया कि अभी टांड़ भूमि वाले धान पर भूरा चित्ती रोग, मध्यम भूमि वाले धान पर झोंका रोग तथा निचली भूमि वाले धान में सीथ ब्लाइट रोग देखने को मिलता है. किसानों को इन खतरों से सावधान रहने की जरूरत है.
धान की पत्ती पर पिन पर माथानुमा आकार का भूरा धब्बा भूरा चित्ती रोग का लक्षण है. पोटाश (20 %) या साफ (0.2 %) या समाधान (0.1 %) या कनटाफ (0.1 %) का घोल बनाकर छिड़काव कर इस रोग से फसल का बचाव की जा सकती है.
झोंका रोग में पहले पत्ती पर और बाद में बाली पर लक्षण दहखते है. पत्ती में नाव या आंख के आकार का भूरा या काला धब्बा और बाद में बाली के डंठल भूरा धब्बा से फसल को नुकसान होता है. खेतों में 25 एवं 50 दिनों के अंतराल खरपतवार निकासी अवश्यक है. इसके लक्षण दीखने पर ट्राइसायकलाजोल (0.6 %) या साफ (0.2 %) का 10–12 दिनों के अंतराल 2-3 बार छिड़काव किया जाना चाहिए.
शीथ ब्लाइट रोग का लक्षण पत्तियों पर हरे-भूरे पुआल के रंग के धारीदार धब्बे बनते है. धान के दाने में भी दिखते है. इस रोग से बचाव हेतु भेलीडामायसीन (0.1 %) या हेक्साको – नाजोल (0.1 %) या बेविस्टीन (0.1 %) के घोल का छिड़काव किया जाना चाहिए.
मृदा वैज्ञानिक डॉ अरविन्द कुमार बताते है कि धान की फसल में खैरा रोग में जिंक की कमी से पौधों की ऊपर से तीसरी-चौथी पत्तियों पर धूलिया धब्बे बाद में आकार में बड़े होकर सम्पूर्ण पत्रफलक में फैल जाते है. कल्लो की संख्या कम एवं जड़ों की वृद्धि रूक जाती है. बालियों में बांझपन आ जाता है. इसका लक्षण दीखने पर 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट का घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये.

