नीता शेखर,
रांची: यह कहानी नहीं एक सच्ची घटना है. आज से लगभग 20 साल पहले की बात है. मैं उस घटना को आज भी भूल नहीं पाती, जो मेरे साथ घटी. मेरी दो बेटियां हैं बड़ी बेटी कक्षा 1 में पढ़ती थी छोटी बेटी नर्सरी में.
15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के समारोह में शामिल होने के लिए मैं बड़ी बेटी को लेकर छोटी बेटी के स्कूल गई थी. कार्यक्रम की समाप्ति पर अभिभावकों से आग्रह किया गया कि वह पंक्तिबद्ध खड़े हो जाए और एक-एक करके कक्षा से अपने बच्चों को ले जाएं.
अभिभावकों की काफी भीड़ थी और जैसी ही मेरी बेटी का नाम पुकारा गया. मैं लपक पड़ी कक्षा की ओर. पल भर को बड़ी बेटी की ओर से मेरा ध्यान हट गया, मेरे तो होश उड़ गए जब मैंने वापस जाकर देखा की बड़ी बेटी अपने स्थान पर नहीं थी, छोटी बेटी को गोद में उठाए मैं अपनी बेटी को खोजने लगी. मुझे अपने चारों ओर अंधेरा नजर आने लगा. मेरे पति बाहर गए थे. सुबह ही उन्होंने फोन करके बताया था आज रांची के लिए निकल रहे हैं. उस समय मोबाइल था परंतु इतना नहीं था कि आप किसी को खबर कर सकें.
मैं तड़प उठी क्या जवाब दूंगी उन्हें? मैं एक छोटी सी जिम्मेवारी भी नहीं निभा पाई, घर में अकेली इंतजार कर रही सास के सामने अपने कलेजे के टुकड़े को खोकर कैसे जाऊं. स्कूल के प्रिंसिपल ने अपनी गाड़ी और स्टाफ दिए ताकि मैं थाने जाकर बेटी के गुम होने की रिपोर्ट दर्ज करवा सकूं. विद्यालय से निकलते ही मेरे आंखों के आगे मेरी सास का चेहरा घूमने लगा कि उन्हें क्या जवाब दूंगी. मैं अपना दुख किसी को बता भी नहीं पा रही थी और मैंने स्कूल के स्टाफ से पहले घर चलने के लिए कहा, 2 घंटे बीत चुके थे. मेरे सब्र का पैमाना छलक रहा था किंतु एक आशा की किरण कहीं ना कहीं बाकी थी. मैं चारों ओर निगाहे दौड़ा रही थी. बार-बार भगवान को कह रही थी कही मेरी बेटी मिल जाए. अचानक मुझे अपनी बेटी दिखाई दी, जब मैं चिल्ला पड़ी “मेरी बेटी” ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी.
स्टाफ ने दौड़कर सामने सड़क पर एक गरीब दिखने वाली लड़की का उंगली थामे चल रही मेरी बेटी को उठा कर लाया और मेरी गोद में डाल दिया. मैंने अपनी बेटी को कलेजे से लगा लिया और चूमने लगी. गाड़ी चल पड़ी. सभी के चेहरे पर मुस्कान थी. हम सभी का ध्यान उस लड़की की ओर से बिल्कुल हट गया जिसकी उंगली थामे मेरी नन्ही बेटी कई किलोमीटर पैदल चलकर आई थी. कौन थी वह ? मेरी बेटी उसे कहां मिली ? इसे लेकर वह कहां जा रही थी. मेरे घर या कहीं और ? क्या वह किसी गिरोह के सदस्य थी, या साक्षात देवी की प्रतिमूर्ति? जिसने मेरी खुशियां लौटा दी थी.
मैंने ड्राइवर को फिर से वहां भेजा किंतु वह वहां नहीं थी. भीड़ में एक छोटी बच्ची को कौन पहचानता है. आज भी उस लड़की को याद करती हूं जिसने मेरी आंखों की रौशनी लौटा दी. मेरी दुनिया में अंधेरा गिरने से पहले खुशियां लौटा दी. आज भी नहीं भूल पाती और यकीनन कभी भूल भी नहीं पाऊंगी. आज मेरी बेटी पढ़ लिख कर नौकरी करने लगी है, फिर भी मैं उस लड़की को कभी भूल नहीं पाती हूं. आज भी दुनिया में ऐसे लोग हैं जो आपकी खुशियां लौटा देते हैं.
वह जहां कहीं भी हो उसे ढेर सारी खुशियां मिले यही मेरी कामना है, जिसने फरिश्ता बन कर मेरे परिवार को बचा लिया.


