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बलमदीना एक्का को पांच दशक से पैतृक गांव में पति का शहीद स्मारक बनने का इंतजार

by bnnbharat.com
December 27, 2020
in समाचार
बलमदीना एक्का को पांच दशक से पैतृक गांव में पति का शहीद स्मारक बनने का इंतजार
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परमवीर चक्र विजेता शहीद अल्बर्ट एक्का की जयंती पर श्रद्धांजलि

रांची: वर्ष 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में पूर्वी पाकिस्तान सीमा (अब बांग्लादेश) पर देश की सीमाओं की रक्षा को लेकर अपने प्राण न्यौछावर करने वाले परमवीर चक्र विजेता शहीद अल्बर्ट एक्का की जयंती पर आज राज्यभर में कई कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है. वहीं 1971 की लड़ाई में शहीद होने वाले परमवीर चक्र विजेता की पत्नी बलमदीना एक्का को पांच दशक बाद भी पैतृक गांव में शहीद स्मारक बनने का इंतजार है.

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में लड़ाई में वीरगति प्राप्त हुए अल्बर्ट एक्का मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. केंद्र और राज्य सरकार की ओर से इन शहीदों के सम्मान और उनके परिजनों तथा आश्रितों को हरसंभव सहायता दी जा रही है, परंतु करीब पांच दशक बीत जाने के बावजूद परमवीर अल्बर्ट एक्का की पत्नी बलमदीना एक्का की एक छोटी सी इच्छा पूरी नहीं हो सकी है.

अन्य शहीदों की भांति बलमदीना एक्का ने सरकार से अपने लिए कई एकड़ जमीन या पैसे की कोई मांग नहीं की, बल्कि बूढ़ी और चलने-फिरने से मजबूर बलमदीना एक्का की अंतिम तमन्ना है कि उनके पति का स्मारक पैतृक गांव में ही उनके जीवित रहते बन जाएं, ताकि वे उस स्मारक पर पुष्प अर्पित कर उनके बलिदान को अंतिम बार नमन कर सके.

1971 की लड़ाई में अल्बर्ट एक्का ने पाकिस्तान के साथ लड़ाई में बहादुरी का परिचय देते हुए अपनी शहादत दी थी और वर्ष 2015 में ही शहादत स्थल त्रिपुरा से उनकी मिट्टी जारी गांव लाकर स्मारक बनाने की बात राज्य सरकार की ओर से की गयी, लेकिन अब तक यह काम भी अधूरा रहा है.

शहीद परमवीर अल्बर्ट एक्का के पुत्र विंसेट एकता का भी कहना है कि कई सरकारों में सिर्फ उन्हें आश्वासन ही मिला लेकिन अब तक एक स्मारक भी बंद कर पूरा नहीं हो सका है. उन्होंने कहा कि उनके पिता ने देश की खातिर उस वक्त प्राणों को न्यौछावर कर दिया था, जब उनकी उम्र सिर्फ एक वर्ष थी. बाद में पिता के साथ काम करने वाले सेना के अन्य जवानों और अधिकारियों से उन्हें वीरता की कहानी जानने को मिली.

उन्होंने कहा कि शहीदों और उनके परिवार के प्रति सरकार का नजरिया इस तरह का है कि करीब 42वर्ष बाद तत्कालीन हेमंत सोरेन सरकार में वर्ष 2013 में उन्हें प्रखंड कार्यालय में नौकरी मिल पायी.उन्हें उम्मीद है कि यह सरकार उनके पिता का स्मारक भी पैतृक गांव में बनाने का सपना पूरा करेगी.

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