रांची: आदिवासियों से संबंधित समस्याओं के निराकरण एवं आदिवासियों की भूमि के संरक्षण हेतु स्पष्ट नीति बनाने के संबंध में मांडर विधायक बंधु तिर्की ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है.
तिर्की ने अपने पत्र में कहा है कि झारखंड राज्य में छोटानागपुर एरिया के अंतर्गत कई जिले रांची, लोहरदगा, गुमला, सिमडेगा, खूंटी, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, खरसावां, लातेहार एवं भंडरिया ब्लॉक गढ़वा ये सभी अधिसूचित क्षेत्र है जो संविधान के शेड्यूल पांच में है.
संथाल परगना के अंतर्गत दुमका, पाकुड़, राजमहल, जामताड़ा, सबडिवीजन सुंदर पहाड़ी बोवारजोर ब्लॉक (गोड्डा) ये सभी जिले एवं ब्लॉक शेड्यूल एरिया में आते हैं.
छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम की धारा 46 संविधान के शेड्यूल 9 में डाला गया है. इस प्रकार यह क्षेत्र एवं काश्तकारी अधिनियम की धारा 46 जो रैयत संरक्षण प्रदान करती है, वो संविधान के अनुच्छेद 31(B) के अंतर्गत पूर्ण रूप से संरक्षित किया गया है. परंतु आज भी आदिवासियों की संरक्षित भूमि की लूट बदस्तूर जारी है,
जो निम्नवार है-
- भू-सुधार अधिनियम 1951 की धारा 5, 6 एवं 7 के अंतर्गत यदि मध्यवर्ती (भूतपूर्व जमींदार) के नाम से लगान का निर्धारण नहीं हुआ है. ऐसी भूमि की लगान निर्धारण पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी जाए.
- भू -सुधार उपसमाहर्ता के स्तर पर यदि लगान निर्धारण का आवेदन प्राप्त होता है. ऐसे सभी आवेदन पर उपायुक्त के अनुमति प्राप्त करना आवश्यक होगा एवं संबंधित अंचल के अंचलाधिकारी दखल के संबंध में प्रतिवेदन प्राप्त किया जाना सुनिश्चित किया जाना आवश्यक हो.
- गैरही जमीन का भुइहरि महतोवाई, भुइहरि पहनाई, भुइहरि डाली कतारी, भुइहरि पनभोरा, भुइहरि मुंडाइन अगर इतने किस्म का खतियान है तो अंचल से रसीद नहीं कट सकती. इतना ही नहीं उपायुक्त को भी रसीद काटने का अधिकार नहीं है, क्योंकि यह बेलगान जमीन है. 1996 में तत्कालीन उपायुक्त रांची राजीव कुमार द्वारा निर्गत पत्र में सभी अंचल को स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि रजिस्टर-2 में अंकित है तो उसे तत्काल प्रभाव से विलोपित किया जाए.
उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि जमीन के संबंध में सरकार की क्या नीति है, स्पष्ट करना चाहिए. रैयत की जमीन कैसे बचें, इस पर ठोस निर्णय लेने की आवश्यकता है. लगान निर्धारण में हो रही धांधली पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है.

