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बिहार चुनाव 2020 : लालू के आसरे वाम सियासत, असमंजस में वामपंथी

by bnnbharat.com
October 6, 2020
in समाचार
बिहार चुनाव 2020 : लालू के आसरे वाम सियासत, असमंजस में वामपंथी
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पटना: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बिहार विधानसभा में 1972 से 1977 तक मुख्य विपक्षी दल रही. इससे पहले भी सदन में पार्टी के सदस्य हमेशा दहाई अंकों में रहे  लेकिन 1977 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रवधान लागू किया, राज्य में वाम राजनीति की ज़मीन सिकुड़ गई. जाति की पहचान राजनीति का केंद्र बनी. जातीय राजनीति सत्ता का समीकरण. बाद में मंडल आंदोलन ने वाम दलों की रही-सही जमीन भी हथिया ली.

जातीय राजनीति में वाम का जनाधार सिमटा

1990 के बाद मंडल आंदोलन की उपज लालू प्रसाद ने जातीय अस्मिता की बहस तेज की और वाम दल अपना आधार खोते गए. 1990 के विधानसभा चुनाव में इंडियन पीपुल्स फ्रंट ने सात सीटों पर जीत दर्ज की थी. इनमें भोजपुर के चर्चित नक्सली नेता जगदीश मास्टर के दामाद भगवान सिंह कुशवाहा भी शामिल थे.
1993 में इसी भगवान सिंह कुशवाहा के नेतृत्व में नक्सली आंदोलन चला रहे आईपीएफ के तीन विधायकों ने लालू प्रसाद से हाथ मिला लिया। धीरे-धीरे राज्य में वर्गीय पहचान की जगह जातीय पहचान का महत्व बढता गया. अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए वाम दलों ने भी वर्गीय पहचान वाली सोच को किनारे कर उसी लालू प्रसाद से हाथ मिला लिया जिस लालू ने बिहार की राजनीति में वाम विचारधारा को हाशिए पर धकेला.

कन्हैया कुमार भी किनारे

जेएनयू दिल्ली छात्र संघ के अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार वाम दलों के लिए एक उम्मीद बनकर उभरे भी तो भाकपा की आंतरिक राजनीति ने उनको मौका नहीं दिया. कन्हैया विपक्ष की आवाज बनकर सामने आए. सांप्रदायिक और जातिवादी राजनीति से अलग जमीनी मुद्दों पर चर्चा शुरू की लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में कन्हैया जिनको उम्मीदवार बनाना चाहते थे पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया. इतना ही नहीं वामपंथी पार्टी भाकपा माले कन्हैया कुमार की राजनीति से असहज महसूस करती है।

मन ही मन खटास भी

वाम दलों का बुनियादी जनाधार अब कुछ जगहों पर ही बचा है, और वो भी बहुत कम. राजद से गठबंधन कर वाम दल जैसे-तैसे वजूद बचाने की जुगत में हैं. राजद ने इस बार भाकपा माले को 19, भाकपा को 6 और माकपा को 4 सीटें दी हैं. वाम दलों और राजद के इस गठबंधन पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। सबसे गंभीर सवाल वामपंथी नेता चंद्रशेखर की हत्या को लेकर उठते हैं.

31 मार्च 1997 को सीवान के जेपी चौक पर चंद्रशेखर समेत भाकपा माले के एक नेता की गोली मारकर हत्या की गई थी. इस हत्याकांड में लालू प्रसाद यादव के करीबी बाहुबली नेता शहाबुद्दीन का नाम आया. वाम दलों के भीतर से ही ये सवाल उभरता है कि जिस पार्टी पर चंद्रशेखर की हत्या करवाने, हत्या आरोपियों को बचाने के आरोप हैं, उसी पार्टी से चुनावी समझौता कैसे किया जा सकता है.

वाम दलों के सभी 29 उम्मीदवार घोषित

भाकपा माले ने अपनो कोटे के सभी 19 उम्मीदवारों के नाम का एलान कर दिया है. भाकपा माले पहले चरण की आठ सीटों पर मैदान में है. भाकपा ने भी अपने सभी 6 और माकपा ने अपने सभी 4 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है.

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