पटना: बिहार विधानसभा चुनाव के परिणामों (Bihar Election Result 2020) को देखते हुए हम कह सकते हैं कि एक बार फिर से एग्जिट पोल (Exit polls) की साख दांव पर लग गई है. पिछले छह विधानसभा चुनावों में ज्यादातर एग्जिट पोल गलत साबित हुए हैं. बिहार में टुडेज चाणक्य ने तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन को 180 सीटें मिलने का अनुमान लगाया था, लेकिन होता इसके वितरीत नजर आ रहा रहा है. नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला एनडीए 130 सीट पर पहुंचता नजर आ रहा है.
एग्जिट पोल पहले भी कई बार गलत साबित हुए हैं. इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे हैं. पिछले दिनों सोशल मीडिया (Social Media) में ये बात वायरल हो रही थी कि ‘रोज़ाना कोई न कोई सर्वे ज़रूर आता है. लेकिन अब तक कोई सर्वे वाला मुझसे पूछने नहीं आया.’ तो क्या ये मान लिया जाए कि ये रायशुमारी फर्ज़ी होती हैं. क्या इसकी उपयोगिता सिर्फ सोशल मीडिया और टीवी चैनल्स पर बहस के लिए होती है? क्योंकि इससे पहले गुजरात, हिमाचल, हरियाणा (Haryana), यूपी, पंजाब और दिल्ली चुनाव (Delhi Election) में भी एग्जिट पोल ने मुंह की खाई है.
एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियां दावा करती हैं कि एग्जिट पोल लोगों की राय होते हैं. लेकिन हकीकत ये है कि ये अक्सर सही साबित नहीं होते. यूपी विधानसभा चुनाव की ही बात कर लीजिए. क्या कोई एजेंसी कह रही थी कि बीजेपी को 324 सीटें मिलेंगी? कोई बता रहा था क्या कि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी 70 में से 67 सीटों पर जीत जाएगी. या फिर 2014 और 2019 में कोई बता रहा था कि बीजेपी की आंधी में कई पार्टियों का खाता तक नहीं खुलेगा. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी एग्जिट पोल गच्चा खा चुका है.
राजनीतिक विश्लेषक आलोक भदौरिया का मानना है कि ‘एग्जिट पोल फर्ज़ी तो नहीं होते, लेकिन इनके सैंपल साइज छोटे होने की वजह से सवाल उठते रहते हैं. सवाल ये कि क्या कोई एजेंसी सिर्फ पांच, 10 और 50 हजार लोगों से बात करके पूरे राज्य की नब्ज़ टटोल सकती है?’

