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कोरोना महामारी से लड़ने मे भाजपा रुकावट पैदा न करे – वामदल

पुलिस प्रशासन के मनोबल को कमजोर करने का गैर जिम्मेदाराना रवैया अपनाए हुए है.

by bnnbharat.com
April 26, 2020
in Uncategorized
कोरोना महामारी से लड़ने मे भाजपा रुकावट पैदा न करे - वामदल

कोरोना महामारी से लड़ने मे भाजपा रुकावट पैदा न करे - वामदल

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रांची: वाम दलों के नेताओं ने कहा है कि झारखंड में एक ओर राज्य की जनता, सरकार, स्वास्थ्यकर्मी प्रशासन, पुलिस, विभिन्न सामाजिक संगठन और राजनीतिक दल कोरोना महामारी से उत्पन्न स्थिति मे एकजुट होकर लोगों को राहत देने और भूख से लोगों को बचाने में जुटे हुए हैं. वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व मुद्दा विहीन बयान बाजी, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए हर मामले में अनावश्यक हस्तक्षेप और पुलिस प्रशासन के मनोबल को कमजोर करने का गैर जिम्मेदाराना रवैया अपनाए हुए है.

भाकपा के राज्य सचिव भुवनेश्वर प्रसाद मेहता, माकपा के प्रकाश विप्लव और भाकपा-माले के जर्नादन प्रसाद ने कहा कि भाजपा का राज्य नेतृत्व प्रधानमंत्री की उस महत्वपूर्ण सलाह को भी दरकिनार कर रहा है. जिसमें उन्होंने कोरोना के खिलाफ लड़ने के लिए जहां विपक्ष की सरकार है वहां रचनात्मक सहयोग देने का आह्वान किया है. इसलिए भाजपा को कोरोना से निपटने के लिए राज्य सरकार की जरूरतों को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाना चाहिए.

इसी क्रम में भाजपा विधायक दल के नेता बाबुलाल मरांडी ने शनिवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर झारखंड के 35 हजार अधिवक्ताओं और उनके अधीनस्थ काम करने वाले 25 हजार लिपिकों की सुध लिए जाने की मांग की है. यह मांग उचित है लेकिन इस पर पहल केन्द्र सरकार को लेना है क्यों कि अधिवक्ताओं के लिए संसद से पारित एडवोकेट एक्ट 1961 जो कि एक केंद्रीय कानून है इसके तहत ही अधिवक्ताओं के कल्याण के लिए माडल – द बार कांऊसिल आफ इंडिया एडवोकेट वेलफेयर स्कीम 1998 संसद से पारित किया गया ताकि अधिवक्ताओं के कल्याण के लिए एक कोष का गठन किया जा सके इसे धरातल पर लागू करने के लिए ही संसद द्वारा एडवोकेट वेलफेयर फंड एक्ट 2001 पारित किया गया है.

वाम नेताओं ने कहा कि इस कानून से यह प्रतीत होता है कि अधिवक्ताओं के वेलफेयर फंड का पुरा संबंध और इसका नियंत्रण केंद्र सरकार के कार्य क्षेत्र के दायरे में आता है. इसलिए बाबूलाल मरांडी को राज्य के अधिवक्ताओं की चिंता है तो उन्हें प्रधानमंत्री और केंद्रीय कानून मंत्री से भी मांग करनी चाहिए कि इस संचित कोष के माध्यम से अधिवक्ताओं और उनके लिपिकों को सहायता प्रदान की जाय जैसा कि वामदलों ने एक सप्ताह पूर्व ही इस प्रकार की मांगों से संबंधित पत्र यूनियन ला मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद को भेजा है.

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