रांची. झारखंड विधानसभा का बजट सत्र कल 26 फरवरी से शुरू होने जा रहा है. बजट सत्र के हंगामेदार होने के आसार है. विपक्ष ने विकास योजना की धीमी रफृतार, पारा शिक्षकों और अन्य संविदा कर्मियों के सेवा स्थायीकरण की मांग, गिरती कानून व्यवस्था, बाबूलाल मरांडी को नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाये जाने और चालू वित्तीय वर्ष में बजट राशि नहीं खर्च होने के मुद्दे को जोर-शोर से उठाने की रणनीति बनायी है. वहीं सत्तापक्ष की ओर से भी विपक्ष की धार को कमजोर करने की रणनीति बनायी गयी है, जबकि सरकार ने पक्ष-विपक्ष के सभी सदस्यों का संवेदनशीलता के साथ जवाब देने तथा समस्या के समाधान का भरोसा दिलाया है.
पिछले वर्ष बजट सत्र के दौरान ही कोरोना संक्रमण के कारण देशव्यापी पूर्ण तालाबंदी के बीच विधानसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गयी थी. इसके बाद विधानसभा का संक्षिप्त सत्र भी आहूत किया गया और एकदिवसीय सत्र में सरना आदिवासी धर्म कोड को लेकर एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा गया. इस तरह से करीब 11 महीने के बाद शुरू हो रहे ज्वलंत मुद्दों पर सदन में एक बार फिर से जोर-शोर से चर्चा होने की संभावना है.
बता दें कि अदालत ने सीओ को चार्जशीट के लिए उसके द्वारा निर्देशित संशोधन को सही ठहराने” के लिए भी कहा. 15 वर्षीय आवेदक के वकील जावेद हबीब के अनुसार, पुलिस ने अपने मूल आरोप पत्र में उनके मुवक्किल पर आईपीसी की धारा 269 (जीवन के लिए खतरनाक बीमारी के संक्रमण फैलने की लापरवाही से काम करना) और 270 (घातक कार्य) फैलने की आशंका जताई थी. जीवन के लिए खतरनाक बीमारी का संक्रमण. सीओ द्वारा पारित आदेशों पर प्रारंभिक चार्जशीट को वापस बुला लिया गया और आईपीसी की धारा 307 के तहत एक नई चार्जशीट पेश की गई.
2 दिसंबर को पारित एक आदेश में, उच्च न्यायालय ने भी आवेदक के खिलाफ अगले आदेश तक आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगा दी. कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई 15 दिसंबर को करेगा.
सुनवाई के दौरान, हबीब ने अदालत को बताया कि अभियोजन पक्ष के अनुसार, आवेदक ने नई दिल्ली में तब्लीगी जमात द्वारा आयोजित एक धार्मिक मण्डली का दौरा किया था, और पुलिस द्वारा बुक की गई वह और अन्य अलग-अलग तारीखों में घर लौट आए थे.
अभियोजन पक्ष द्वारा आरोप लगाया गया है कि आवेदक और अन्य अभियुक्तों ने स्थानीय प्रशासन को उनके आगमन के बारे में सूचित नहीं किया था और स्वैच्छिक संगरोध के तहत नहीं गए थे, और एक मुखबिर से सूचना प्राप्त करने के बाद उन्हें अलग-अलग तारीखों पर छोड़ दिया गया था.
हबीब ने दावा किया कि भले ही जांच के दौरान एकत्र किए गए सबूतों के साथ-साथ प्राथमिकी उनके अंकित मूल्य पर ली गई हो, आवेदकों के खिलाफ कोई अपराध नहीं बताया गया है. हाईकोर्ट ने अतिरिक्त महाधिवक्ता को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए 10 दिन का समय दिया है.

