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नासूर………..शारीरिक चोट भर जाती है पर कभी नहीं भरती मानसिक चोट

by bnnbharat.com
May 3, 2020
in समाचार
नासूर………..शारीरिक चोट भर जाती है पर कभी नहीं भरती मानसिक चोट

नासूर...........शारीरिक चोट भर जाती है पर कभी नहीं भरती मानसिक चोट

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नीता शेखर,

आज मैं अंजू के घर गई वह मेरी बचपन की सहेली है. उसके साथ बैठी तो बहुत सारी बातें चलचित्र की भांति सामने से गुजरते गए. पर क्या सारी गलती अंजू की थी. घर परिवार का कोई दोष नहीं था, वक्त रहते अगर किसी ने उसे संभाल लिया होता तो शायद यह हालात नहीं होते.

अंजू की शादी एक अच्छे परिवार में हुई थी. वह भी काफी खुश थी. शुरु शुरु में तो उसे कुछ एहसास नहीं हुआ पर कुछ ही दिनों बाद, उसने देखा उसकी सास किसी न किसी बात पर बेहोश हो जाया करती. पहले तो ऐसा लगता था कि शायद उनको कोई बीमारी हो मगर बाद में उसे एहसास हुआ कि नहीं यह तो एकदम ड्रामा करती है.अंजू को समझ नहीं आता था आखिर ऐसा क्यों करती है. अंजू संयुक्त परिवार में रहती थी पर उसके बाद सभी अपने-अपने नौकरी की वजह से बाहर चले गए.

अब घर में केवल 3 लोग बच गए. अब तो अंजू और परेशान रहने लगी. उसे उसकी सास ज्यादा ही परेशान करने लगी थी. अगर उसने किसी को भोजन पर बुलाया तो उसी समय बेहोशी का नाटक करके सब को तनाव में डाल देती थी. ऐसी स्थिति पैदा हो जाती थी कि तनाव की वजह से सब कुछ बर्बाद हो जाता था. इसका नतीजा यह हुआ कि अंजू चुप चुप रहने लगी. कहते हैं ना कि शारीरिक चोट भर जाती है, पर मानसिक चोट नहीं भरती है.

अब अंजू ना किसी को दिखा सकती थी ना बता सकती थी. अंजू को बार-बार मानसिक आघात पहुंचता. इसका नतीजा यह हुआ कि अब घर में अच्छा ही नहीं लगता था. उसे लगता घर से दूर चली जाए. शॉपिंग करने में काफी अच्छा लगता है. जब की जरूरत हो ना हो बिना मतलब के ही शॉपिंग किया करती. घर से बाहर आने के चक्कर में अंजू का शौक जुनून बन गया था. अब ऐसा हो गया था कि उसका जुनून उस पर ही हावी हो गया. वह तो बस तनाव से भागने के चक्कर में शॉपिंग कर लिया करती थी पर यह सोचने समझने की शक्ति खत्म हो गई थी. इसका नतीजा क्या होगा इसका परिवार पर क्या असर होगा.

अब तो पैसे की ऐसी लत लगी कि सभी पैसे धीरे-धीरे खत्म हो गए. अब उसने अपने जेवरों को बेचना शुरू कर दिया धीरे-धीरे हालात यह हो गए कि उसके जेवर भी खत्म हो गए. अंजू घर के कामों और बाहर के कामों में इतनी होशियार थी. आज वह खुद ही अपना घर परिवार सब को बर्बाद कर रही थी. उसके अंदर की ज्वाला प्रतिशोध बनकर उसके ही घर को बर्बाद कर रही थी पर उसने कभी सोचा ही नहीं कि इस का नतीजा क्या होगा. अब ना तो उसको घर में मन लगता, ना घर के कामों में. पति का भी साथ नहीं होता था. वह हमेशा अपनी मां की बातें सुनती.

इससे उसके अंदर डर और भय बैठ गया. वह दिन पर दिन गलतियां करती चली गई, उसके सारे क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड बैंक बैलेंस खत्म हो गई थे और बाहर से तनाव और घबराहट. अब क्या होगा ? फिर उसने आत्महत्या की कोशिश कर डाली. उसके पति को पता चला कि उसने शॉपिंग के जूनून में क्या कुछ कर डाला. उसके पति बहुत ही समझदार थे. उन्होंने उसकी मानसिक स्थिति को समझा. मैंने उसका ध्यान नहीं रखा. बहुत बड़ी गलती की पर हिम्मत नहीं हारी. उसका पूरी तरह से इलाज करवाया. उसे बाहर हॉस्पिटल में एडमिट कराया. वहां वह लगभग 2 महीने रही. जल्दी ठीक होने लगी. डॉक्टरों ने बताया कि इनका शौक एडिक्शन बन गया था. अंजू पूरी तरह से ठीक हो कर घर आ गई थी. घर के हालात अभी भी वैसे ही थे ना उसके सास बदली थी ना बदलेगी.

आज इतना बदल गए हैं कि अंजू का ख्याल रखने लगे. हां अंजू एकदम बदल गई. आज भी उसके कंधे पर उतना ही काम है मगर उसने अपना रास्ता बदल लिया. आज एक स्कूल में पढ़ा रही है. आज उसे महसूस होता है कच्ची उम्र में इतना दिमाग सही नहीं होता. समय पर उसने पति को बता दिया होता तो ऐसा नहीं होता. मगर होनी को कौन टाल सकता है. अपनी कहानी सुना फूट-फूट कर रोने लगी.

अपनी दोस्त को समझाया जो हुआ उसे भूल जा पीछे मुड़कर मत देख. सही कहा है किसी ने शारीरिक चोट भर जाती है पर मानसिक चोट कभी नहीं भरती बल्की पूरे जीवन के लिए यह नासूर बन जाती है.

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