खास बातें:-
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चुटिया के दारोगा रंजीत कुमार को भी बताया गया था अपराधी
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विशेष शाखा के एडीजीपी को भी भेजी गई थी रिपोर्ट
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जूनियर पुलिस अफसर भी उठा रहे हैं सवाल
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कह रहे जब कार्रवाई की बारी आती है तो दरोगा व इंस्पेक्टर नप जाते हैं
रवि,
रांचीः झारखंड में फोन टेप करने के लिए पुलिस महकमे के आला अफसर किसी को भी कुछ भी बता देते थे. अब फोन टैपिंग मामले में पुलिस महकमे के आला अफसरों के होश उड़ गए हैं. डोरंडा थाना में सीआइडी के डीएसपी रंजीत लकड़ा ने जो एफआईआर दर्ज कराई है वो पुलिस के लिए चिंतनीय है. जांच के क्रम में जिन पुलिस कर्मियों के फोन टेप किए जाने और उनके बारे में की गई अनुशंसा का पता चला है, उनमें सीआइडी में पूर्व में चौका के तत्कालीन थाना प्रभारी रतन कुमार जो वर्तमान में पुलिस मुख्यालय में पदस्थापित हैं , उनका फोन टेप किया गया था. रतन कुमार को अपराधी बताया गया था. रतन कुमार जगन्नाथपुर थाना के प्रभारी भी रह चुके हैं.
दारोगा रंजीत सिंह को बताया गया था अपराधी
रांची के चुटिया थाना में पदस्थापित दारोगा रंजीत सिंह को अपराधिक गतिविधियों में शामिल बताया गया था. एक और पुलिसकर्मी मो इरफान, जिसका फोन टेप किया गया था, उसे पशु तस्कर बताया गया था. इन तीनों के संबंध में पाक्षिक प्रतिवेदन विशेष शाखा के एडीजीपी को भी उस समय भेज दिया गया था. रिपोर्ट में रतन कुमार सिंह को रांची का सक्रिय अपराधी बताया गया था. रंजीत सिंह के मोबाइल के धारक की पहचान रौनक कुमार के रूप में की गई थी. उसे धनबाद क्षेत्र का गोवंशी तस्कर बताया गया था. एफआईआर में तीनों के फोन टैपिंग को लेकर मौलिक अधिकार हनन का भी जिक्र है.
उठ रहे हैं सवाल
जूनियर पुलिस अफसर सवाल उठा रहे हैं कि सीनियर अफसरों के कहने पर वे काम करते हैं. जब कार्रवाई की बारी आती है तो दारोगा और इंस्पेक्टर ही नप जाते हैं. जब आइपीएस अफसर फोन नंबरों को गृह विभाग भेजने के लिए अनुशंसा कर रहे थे, तो उन्हें भी इसकी जांच करनी चाहिए थी. ये नंबर किसके हैं.
सीआइडी के एसपी-डीएसपी से की जा चुकी है पूछताछ
डोरंडा थाना में दर्ज एफआईआर में कहा गया है कि फोन टेप करने के लिए जो अनुरोध पत्र गृह विभाग को भेजा जाता था, उसमें तत्कालीन एसपी मनोज रतन चोथे और तत्कालीन डीएसपी विनोद रवानी के हस्ताक्षर होते थे, इन दोनों ने पूछताछ के क्रम में बताया कि सीआइडी की तकनीकी शाखा के प्रभारी इंस्पेक्टर अजय कुमार साहू जिन नंबरों को लेकर आते थे, उन्हें आवश्यक कार्रवाई के लिए आगे प्रेषित कर दिया जाता था.
इन दोनों अफसरों ने यह भी कहा कि उनके द्वारा नंबरों का सत्यापन नहीं किया गया और न ही सुना गया. मोबाइल नंबर को टेप करने के लिए जो प्रतिवेदन भेजे गए उसमें पुलिसकर्मियों की वास्तविक पहचान छिपा दी गई थी. इन दोनों के बयानों के आधार पर ही इसके लिए इंस्पेक्टर अजय कुमार साहू को दोषी पाया गया और एफआईआर में उनका नाम आरोपी के रूप में शामिल किया गया है.

