भाषा और साहित्य

कृष्ण की हथेली पर सजी थी कर्ण की चिता : मै अंग हूं – 17

कर्ण की इहलीला खत्म हो चुकी थी। बच गये थे कृष्ण, जिन्हें कर्ण की अंतिम इच्छा पूरी करनी थी। कुंवारी भूमि पर चिता सजाकर। मगर, कहां मिलेगी ऐसी भूमि ? कृष्ण के समक्ष एक चुनौती भरा प्रश्न ! कहते हैं,...

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अंत समय में भी दानवीर बना रहा कर्ण : मैं अंग हूं – 16

ईस बात को सभी जानते हैं कि जिस  महाभारत युद्ध को अपने शस्त्र और शौर्य के दम पर अंगराज कर्ण ने दो दिन आगे बढ़ाया था अर्थात 16 दिन में समाप्त हो जाने वाले 'महाभारत' को 18 दिनों तक चलने...

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कर्ण की चिताभूमि बनने का गौरव प्राप्त हुआ ‘चांदन’ को : मैं अंग हूं – 15

झारखंड का वह संतालपरगना (देवघर) हो गया है, जो कभी अंग देश का अभिन्न अंग हुआ करता था। बात चूंकि कर्ण और अतीत वर्तमान के कर्णगढ़ तथा खोदाई से प्राप्त पुरासामग्रियों पर चल रही है, लिहाजा अपनी कथा बांचने के...

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मैं अंग हूं : आज भी परिलक्षित है कर्णगढ़ की चहारदीवारी के अंश – 14

मै 'अंग' समय के प्रवाह में इतिहास तो बन गया, मगर कब्र में लेटकर भी मैंने अपनी आंखें हमेशा खुली रखीं और अपनी माटी पर होने वाले तमाम परिवर्तनों का अवलोकन करता रहा। यह कर्णगढ़ तब नहीं था, जब इस...

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मैं अंग हूं : अंगदेश की अपनी कुलदेवी थी – 13

कर्णगढ़ यानी कि कर्ण की नगरी की खोदाई में शृंगकालीन टेराकोटा की कई महत्वपूर्ण कलाकृतियां प्राप्त हुई हैं, जिनमें एक है खंडित नारी की प्रतिमा। उस प्रतिमा की विशेषता उसके शीर्ष के चारों ओर आठ अस्त्र-शस्त्रों का सजा होना है,...

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…तो कर्ण की मंजूषा अधिरथ के हाथ नहीं लगती : मैं अंग हूं – 12

कर्णगढ़ और गंगा... गंगा और कर्णगढ़... एक दूजे का पूरक... एक दूजे से अटूट रिश्ते में बंधे हुए। गंगा करीब बहती नहीं तो कर्ण की मंजूषा अधिरथ के हाथ नहीं लगती। तब कर्ण गढ़ के आबाद होने का कोई प्रश्न...

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मैं अंग हूं : महाभारतकालीन सभ्यता का साक्षी है कर्णगढ़ – 11

चम्पा-तट से थोड़ा हटकर आइये, अब चलते हैं उस कर्णगढ़ पर, जो महाभारत कालीन सभ्यता की साक्षी है। कोई नहीं जानता कि इसके सीने में कितने पौराणिक अवशेष दफन हैं। यही वह स्थल है, जहां कभी कुंती पुत्र कर्ण का...

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मैं अंग हूं : चम्पा नदी में उफान रहने तक वजनदार रही चम्पानगर की हैसियत -10

जब मालिनी थी तब भी और मालिनी जब चम्पा बन गयी तब भी, चम्पा जब चम्पापुरी कहलाने लगी तब भी और जब चौपाई नगर के रूप में नामित हुई तब भी, यह चम्पा नदी अपने इसी नाम के साथ अविरल...

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मैं अंग हूं : शृंगी को राजसिंहासन पर देख ऋषि का वात्सल्य छलक पड़ा – 9

लोगों और दरबारियों का अभिवादन स्वीकारते हुए ऋषि विभांडक जब राज भवन के दरबार हाल में पहुंचे तो मालिनी राजवंश के स्वर्णजड़ित राजसिंहासन पर अपने पुत्र शृंगी और उनके वाम पार्श्व में राजा रोमपाद की पोष्टा पुत्री शांता को D...

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मैं अंग हूं : श्रृंगी तो बस श्रृंगार देखने में व्यस्त थे – 8

शहनाई के स्वर, जयकारे के शोर, आरती और पुष्प वृष्टि के कारणों से बिल्कुल नावाकिफ शृंगी तो बस नगर की शोभा और नर-नारियों के शृंगार देखने में व्यस्त थे। एक रंग-बिरंगी दुनिया में खो जाने के चलते आश्रम की यादें...

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