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रंग बदलने वाले बगुले: जलवायु परिवर्तन का पक्षियों पर असर

कैटल इगरेट जून से पहले घोंसला बनाने में जुटे

by bnnbharat.com
May 12, 2020
in Uncategorized
रंग बदलने वाले बगुले: जलवायु परिवर्तन का पक्षियों पर असर

रंग बदलने वाले बगुले: जलवायु परिवर्तन का पंक्षियों पर असर

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हजारीबाग: साधारण से दिखनेवाले पशु बगुला या गाय बगुला को प्रकृति ने असाधारण गुण से नवाजा है. सामान्य दिनों में सफेद दिखनेवाले गाय बगुला या केटल ईग्रेट प्रजनन काल में नारंगी रंग से सज जाते हैं. इनके सिर के पंखों का रंग बदल जाता है. चोंच पीले नारंगी हो जाते हैं.

भारत में जून से इनका प्रजनन काल प्रारंभ होता है. जलवायु परिवर्तन के कारण इन्होंने मई माह में ही घोंसला बनाना प्रारंभ कर दिया है.

यह पर्यावरण पर पड़े जलवायु परिवर्तन का असर है. अभी सप्ताह में अमूमन एक – दो दिन बारिश हो जा रही है. ज्येष्ठ माह प्रारंभ हो गया है लेकिन लोगों को ज्येष्ठ की दुपहरी का अहसास नहीं हो रहा है. जलवायु परिवर्तन ने पशु पक्षियों के आवासन व्यवहार को भी प्रभावित किया है.

सदर अस्पताल हजारीबाग परिसर के पेड़ों पर पशु बगुला (कैटल इगरेट) ने समय से पूर्व घोंसला बनाना शुरू कर दिया है. इगरेट जून से अगस्त के बीच घोंसला तैयार कर अंडे देते हैं. अभी से ही कई घोंसले तैयार हो चुके हैं. पेड़ की पतली टहनियों और घास को डालकर घोंसले तैयार होते हैं. युवा एगरेट इसको तैयार करने में लगे हैं. घोंसला तैयार होने के बाद इनमें अंडा दिया जाएगा. अंडे को लगभग तीन सप्ताह तक नर और मादा दोनों मिलकर गर्मी ( इंकुबेशन) देंगे, इसके बाद चूजे निकल आएंगे.

प्रजनन काल में बदल जाता है रंग

कुछ पक्षियों का रंग प्रजनन काल में बदल जाता है. ऐसा ही कैटल इगरेट के साथ भी होता है. इसके सिर, गर्दन और उसके नीचे के पंख और चोंच का नारंगी रंग में बदल जाता है. प्रजनन काल के बाद इनके पंखों का रंग सफेद और चोंच पीला हो जाता है. कैटल इगरेट का रंग भी समय से पहले बदल गया है. बर्ड वाचर पक्षियों के व्यवहार से अनुमान लगाते हैं कि मानसून पहले आ जाएगा. इनका भोजन मेढ़क, छिपकली, टिड्डा और बिना रीढ़ वाले कीट हैं.

सामाजिक सुरक्षा के लिए मानव आबादी के बीच घोंसला

पंछियों के घोंसला में रहनेवाले चूजों को बचाने की चिंता रहती है. इसी को लेकर कैटल इगरेट मानव आबादी के बीच के पास पेड़ों को घोंसला बनाने के लिए चुनते हैं. सामाजिक सुरक्षा के लिए एक पेड़ पर इनके कई दर्जन घोंसले हो सकते हैं. मानव आबादी के बीच इनके चूजों को परभक्षी का खतरा नहीं रहता है. रैट स्नेक जैसा परभक्षी इनके बच्चों को खा जाता है. समूह में रहने पर परभक्षी पर ये मिलकर सुरक्षात्मक हमला करते हैं.

साभार: मुरारी सिंह

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