रांची: भाजपा शासित राज्यों में नियोक्ताओं के पक्ष में अगले तीन साल तक श्रम कानूनों को निलम्बित रखने और काम का घंटा 8 से 12 किए जाने के खिलाफ ट्रेड यूनियनों और औद्योगिक श्रमिक फेडरेशनों के आह्वान पर 22 मई को अखिल भारतीय विरोध दिवस सफल करें.
श्रमिक संगठनों इंटक के राकेश्वर पांडेय, एचएमएस के राघवन रघुनंदन, सीटू के प्रकाश विप्लव, एटक के पी. के. गांगुली, एक्टू के शुभेंदु सेन, टीयूसीसी के सोमनाथ मुखर्जी और एआईटीयूसीसी सिद्धेश्वर सिंह ने कहा कि श्रमजीवी जनता के बहुमत को लॉकडाउन के दौरान काम से हटाने, घोषणा के बावजूद वेतन नहीं देने, निवास से बेदखल करने जैसे अमानवीय परेशानियों में झोंक दिया गया है और इन मजदूरों पर भारी विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा है.
इन मजदूरों को मुनाफे के भूखे मालिक वर्ग द्वारा और निचोड़े जाने की कवायद की जा रही है. इस काम में वर्तमान सरकारों ने मालिकों के पक्ष में श्रमजीवी जनता को गुलाम बनाने के लिए इन पर अपने विषाक्त फनों और हिंसक नूकीले पंजों के साथ हमला कर दिया हैं. दूसरी ओर आज लाखों मजदूर अपने परिवारों के साथ जिसमें छोटे छोटे बच्चे भी शामिल हैं. पैदल ही हजारों किलोमीटर दूर अपने गृह राज्य के लिये चल पड़े हैं. इनमें से कई ने भूख प्यास से दम तोड़ दिया है.
कई लोग दुर्घटनाओं के चलते मौत के शिकार हो गए हैं. देश के जीडीपी में 60 प्रतिशत का योगदान करने वाला मजदूर वर्ग आज कॉर्पोरेट परस्त मोदी सरकार के अनप्लांड लॉकडाउन की मार झेल रहा है. मजदूर वर्ग की इस बेबसी का लाभ उठाकर शासक वर्ग एक झटके में भारत के श्रमिक वर्ग द्वारा 100 साल के संघर्षों से हासिल किए गए उनके अधिकारों को खत्म करने की साजिश कर रहा है ताकि देश के मेहनतकशों को गुलाम बनाया जा सके. लेकिन देश का मजदूर वर्ग सरकार और कार्पोरेट घरानों के इस मंसुबे को कामयाब नहीं होने देगा.
श्रमिक संगठनों के नेताओं ने कहा कि केंद्रीय सरकार ने इस क्रूर कवायद को शुरू करने के लिए अपनी आज्ञाकारी राज्य सरकारों को बेलगाम छोड़ देने की रणनीति बनाई है. भाजपा के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार ने अगुआई करते हुए एकतरफा तौर पर फैक्टरी एक्ट को दर किनार कर बिना वैध मुआवजे के दैनिक कामकाज का समय 8 घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे कर दिया है.
हरियाणा और मध्य प्रदेश की सरकारों ने भी इसी नक्से कदम पर चलना शुरू कर दिया है और वहां भी यही फरमान जारी हो गया है. अब महाराष्ट्र व त्रिपुरा की सरकारें भी कथित तौर पर उसी दिशा में आगे बढ़ रही है. इस दिशा में सबसे नए है उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के अधिक आक्रामक कदम, जो अपने कॉर्पोरेट आकाओं के आदेशों पर लगभग सभी श्रम कानूनों के दायरे से कॉर्पोरेट नियोक्ताओं को जिम्मेवारियों से मुक्त करने के लिए लाए गए है.
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने 1000 दिन यानी 3 साल के लिए फैक्ट्री अधिनियम, मध्य प्रदेश औद्योगिक संबंध अधिनियम, औद्योगिक विवाद अधिनियम, ठेका श्रम अधिनियम आदि जैसे विभिन्न श्रम कानूनों के तहत मालिकों को उनके मूल दायित्वों से मुक्त करने के लिए प्रशासनिक आदेश, अध्यादेश के जरिये परिवर्तन के निर्णय की घोषणा की है.
इसके चलते नियोक्ताओं को “अपनी सुविधानुसार“ श्रमिकों को काम पर रखने या निकाल बाहर करने (लगाओ-भगाओ) के लिए सशक्त बनाया गया है, और उक्त अवधि के दौरान प्रतिष्ठानों में श्रम विभाग का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा. इतना ही नहीं, नियोक्ताओं को मध्य प्रदेश श्रम कल्याण बोर्ड को प्रति श्रमिक 80 रुपये के भुगतान से भी छूट दी गई है.

