रांची: किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में पारंपरिक खेती किसानी को तकनीक के साथ जोड़ने के अलावा पशुपालन को बढ़ावा देकर प्रधानमंत्री के सपने को पूरा किया जा सकता है.
रांची के प्लांडू स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ० ए के सिंह को लगता है कि प्रवासी कामगारों को कृषि और कृषि आधारित उद्योग से जोड़कर रोजगार की परेशानी दूर की जा सकती है.
वे कहते हैं कि ऐसा देखा गया है के उसमे से 70 प्रतिशत के आस पास मजदूर भाई कुशल और अर्ध कुशल की श्रेणी में हैं. कृषि और कृषि आधारित उद्योग से अगर उनको जोड़ा जाएगा तो निश्चित रूप से आत्मनिर्भर भारत की ओर हम बढ़ेंगे.
कृषि आधारित दर्जनों उद्योग किसानों के साथ-साथ प्रवासी कामगारों की आमदनी बढ़ाने में सहायक हो सकता है. भारतीय प्राकृतिक रोल एवं गोंद संस्थान, रांची के निदेशक डॉ. के के शर्मा कहते हैं कि झारखंड जैसे राज्यों में लाह की खेती से प्रवासी कामगारों को जोड़कर रोजगार का बेहतर विकल्प दिया जा सकता है.
वे कहते हैं कि उन्हें अगर लाह की खेती से जोड़ा जाए तो मनरेगा से जोड़ते हुए उनके लिए रोजगार के अच्छे साधन बनाए जा सकते हैं.
दोनों संस्थानों के वरिष्ठ वैज्ञानिकों कि राय है के तकनीक और नए प्रयोगों के जरिए किसान आसानी से आत्मनिर्भर बन सकते हैं. कोरोना संक्रमण काल में प्रवासी कामगारों को रोजगार मुहैया कराना एक बड़ी चुनौती है, लेकिन सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान की शुरुआत कर चुनौती से निपटने की तैयारी कर ली है और इसमें शोध संस्थान भी अहम भूमिका निभा रहे हैं.

