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लॉकडाउन में बढ़ा अवसाद, यू-स्ट्रेस की जगह डि-स्ट्रेस हावी होना हुआ खतरनाक

by bnnbharat.com
June 16, 2020
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लॉकडाउन में बढ़ा अवसाद, यू-स्ट्रेस की जगह डि-स्ट्रेस हावी होना हुआ खतरनाक

लॉकडाउन में बढ़ा अवसाद, यू-स्ट्रेस की जगह डि-स्ट्रेस हावी होना हुआ खतरनाक

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  • राजधानी रांची समेत विभिन्न जिलों में पूर्ण तालाबंदी अवधि में दर्जनों लोगों ने की खुदकुशी

  • फिजिकल इम्यूनिटी के साथ साईकोलॉजिकल इम्यूनिटी पर भी रखें नजर

रांची: कोरोना वायरस के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के बीच विभिन्न कारणों से युवाओं और रोजी-रोजगार के संकट से जूझ रहे लोगों में अवसाद (डिप्रेशन) बढ़ा है. झारखंड की राजधानी रांची, उप राजधानी दुमका, जमशेदपुर, धनबाद और बोकारो समेत राज्य के अन्य जिलों में पिछले ढ़ाई-तीन महीने में डिप्रेशन के कारण दर्जनों लोगों ने खुदकुशी कर ली. मनोचिकित्सकों का कहना है कि कोरोना वायरस कोविड-19 से मुकाबला करने के लिए फिजिकल इम्यूनिटी को बनाये रखने के साथ ही साईकोलॉजिकल इम्यूनिटी पर भी ध्यान केंद्रित करने की जरुरत है. एपिडिमोलॉजी जर्नल की एक रिपोर्ट आयी है, जिसके अनुसार देश में आधे से ज्यादा लोग अवसादग्रस्त है.

मानसिक रोग चिकित्सकों का कहना है कि इंसान के पास साईकोलॉजिकल कैपिटल होना बेहद जरूरी है. सक्सेस के लिए स्ट्रेस होना भी जरूरी है, स्ट्रेट को दो हिस्सों में बांट कर देखा जाता है, एक यू स्ट्रेस और दूसरा डि स्ट्रेस. यू स्ट्रेस अर्थात इच्छित तनाव लोगों को आगे बढ़ने में मदद करता है, वहीं डि स्ट्रेस अर्थात असंमित, अतार्किक या अवांछित तनाव सेहत के लिए खतरनाक है.  हाल के दिनों में डि स्ट्रेस की मात्रा लोगों में बढ़ी है. इसके लिए साईकोलॉजिकल इम्यूनिटी बढ़ानी बेहद जरूरी है. दोस्त, फैमिली, आउटलुक, ऑपटिमिस्टिक थिंकिंग साईकोलॉजिकल इम्यूनिटी को बढ़ाता है.

राजधानी स्थित रांची इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो – साईक्रट्री एंड एलायड साईंस, रिनपास के निदेशक डॉ. सुभाष सोरेन ने बताया कि लॉकडाउन के कारण डिप्रेशन के मामले बढ़े है, चाहे वह निजी मामले हो या फिर व्यवसायिक मामले, पूर्ण तालाबंदी से उत्पन्न परिस्थिति और मौजूदा हालात में लोगों के बीच डिप्रेशन के मामले बढ़े है. उन्होंने यह भी कहा कि भले ही अभी ऐसे मामले अस्पताल या चिकित्सक तक नहीं पहुंच रहे है, लेकिन डिप्रेशन के मामलों में प्रारंभिक संकेत को समझने की जरूरत है. हालांकि डिप्रेशन के मामलों में प्रारंभिक संकेत कई लोगों को समझ में नहीं आते, इसलिए लोग चिकित्सकों की सलाह को नजरअंदाज करते हैं या उनके पास नहीं पहुंचे, ऐसे मामलों में परिवार, आसपास के लोग और समाज की भूमिका अहम होती है. परिवार के सदस्यों की जिम्मेवारी है कि डिप्रेशन में गये सदस्य को सुरक्षित महसूस कराएं और उनके साथ उनकी समस्याओं पर चर्चा करें.

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