चंदन मिश्र (वरिष्ठ पत्रकार),
रांची: झारखंड में आनेवाले एक दो महीने सियासी लिहाज से काफी अहम होंगे. सूबे की सत्तारुढ़ झामुमो-कांग्रेस की सरकार और विपक्षी दल भाजपा के बीच दो सीटों पर उपचुनाव के बहाने सियासी जंग होगा. इसके साथ होगी तीन बड़े नेताओं की अग्निपरीक्षा.
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव और भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी को इस चुनाव में अपनी नेतृ्त्व क्षमता और चुनावी रणकौशल दिखानी होगी. चुनाव में दलों की हार-जीत से उनकी भूमिका भी परिभाषित होगी.
उपचुनाव के परिणाम बताएंगे कि किस नेता की नाक बचेगी, किसकी कटेगी. उपचुनाव को लेकर राजनीतिक सरगरमी अब पूरे उफान पर है. भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी दिल्ली बुलाए गए हैं. संभावित उम्मीदवारों के नाम पर चर्चा और चुनावी रणनीति पर बातचीत के लिए बाबूलाल मरांडी दिल्ली पहुंचे हुए हैं.
कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी आरपीएन सिंह आज अपने पार्टी नेताओं के साथ वेब मीटिंग कर चुनावी ताना-बाना बुन रहे हैं. मुख्यमंत्री और झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन इस मामले में दो हाथ आगे बढ़कर विधानसभा के मानसून सत्र के पहले तीन दिन का दुमका दौरा कर चुनावी मैदान ‘ठीक-ठाक’ कर आए हैं.
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव कुछ दिन पहले बेरमो के पार्टी नेताओं और संभावित उम्मीदवार के साथ दिन भर की बैठक कर आरंभिक तैयारी पूरी कर ली है. बाबूलाल मरांडी संभवत 26 से दुमका के दौरे पर रहेंगे.
वह अगले कुछ दिनों तक रहकर चुनावी मैदान और खिलाड़ियों का जायजा लेंगे. अब सबको चुनाव आयोग की कार्यक्रम घोषणा का इंतजार है. चुनाव की घोषणा बिहार चुनाव के साथ ही होनी है, जिसके दिन गिने रह गए हैं.
दुमका सीट मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बरहेट से भी जीतने के कारण छोड़ दी है. यह उनकी सीट थी और हेमंत सोरेन चाहेंगे कि उपचुनाव में भी वह यह सीट अपने उम्मीदवार को जीत दिलाकर भेंट दें. संभावना है कि इस सीट पर हेमंत सोरेन के अनुज बसंत सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार होंगे.
इधर, उनके सामने भाजपा से कौन होगा, यह जल्द ही साफ हो जाएगा. लेकिन पूर्व मंत्री लोईस मरांडी संभावित उम्मीदवारों की सूची में हैं. अंतिम समय में कोई नया नाम सामने आ जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए. लेकिन इस सीट पर चुनावी जंग उम्मीदवारों से कहीं ज्यादा दो नेताओं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के बीच होनेवाली है.
मुख्यमंत्री को अपनी पार्टी के नेतृत्व श्रेष्ठता और सरकार के कामकाज को बतौक उपलब्धि पेश कर चुनावी जंग जीतने का भरोसा है. वहीं बाबूलाल मरांडी के लिए यह उपचुनाव लिटमस टेस्ट की तरह साबित होने वाला है. भाजपा में वापसी के बाद यह उनका पहला चुनाव होगा, जब उन्हें पार्टी के लिए ‘ कुछ ’ करके दिखाना है. इसी ‘कुछ’ के अंदर कई बातें निहीत हैं.
संथाल परगना झामुमो के लिए गढ़ है और भाजपा के नेता बाबूलाल मरांडी का कर्म क्षेत्र. दोनों नेताओं को अपनी सियासी ताकत और जनसमर्थन पर पूरा आसरा है. हेमंत सोरेन ने तो ताजा तरीन उदाहरण पेश कर दिखाया है कि वह सूबे की सत्ता पर किस तरह काबिज हुए हैं. लेकिन 14 साल तक भाजपा से बाहर रहकर बाबूलाल मरांडी को दिखाना है कि अब वह भाजपा के लिए कितने प्रभावशाली हैं.
उम्मीदवार को लेकर भाजपा जीत की बहुत उम्मीद नहीं पाल सकती है, क्योंकि लुईस मरांडी को अभी हारे हुए नौ महीने हुए हैं. वैसे भी यह इतिहास रहा है कि उपचुनाव में जीत के समीकरण सत्तारुढ़ दलों के पक्ष में बनते रहे हैं, कुछ अपवादों को छोड़ दें तो. इसलिए दुमका उपचुनाव हेमंत सोरेन बनाम बाबूलाल मरांडी के बीच होता दिखाई दे रहा है. दोनों नेताओं और उनके दलों की साख बचाने की बड़ी चुनौती होगी.
बेरमो में कांग्रेस बनाम भाजपा
बेरमो में कांग्रेस के दिवंगत नेता राजेंद्र प्रसाद सिंह की खाली सीट को भरने के लिए कांग्रेस उनके पुत्र अनूप सिंह पर दांव लगा सकती है. यह सीट कांग्रेस के लिए बहुत अहम होगी. इसमें कांग्रेस अध्यक्ष रामेश्वर उरांव के नेतृत्व को भी कसौटी पर कसेगी.
रामेश्वर उरांव के नेतृत्व वाली कांग्रेस 2019 के विधानसभा चुनाव में राज्य बनने के बाद सबसे अधिक सीटें जीतकर इतिहास कायम किया है. लिहाजा उनके लिए भी इस सीट पर जीत दिलाना बड़ी चुनौती होगी.
बेरमो के दिवंगत विधायक राजेंद्र प्रसाद सिंह के प्रति बेरमो की जनता के दिलों में कितनी जगह बरकरार है, उपचुनाव यह भी साबित करेगा. इस सीट पर भाजपा के लिए उम्मीदवार से कहीं ज्यादा नेतृत्व क्षमता की परीक्षा होने वाली है.
भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश की भी विधायक दल नेता बाबूलाल मरांडी के साथ बड़ी परीक्षा होनेवाली हैं. दोनों नेता राजनीति के पुराने मित्र रहे हैं और दोनों की ट्यूनिंग भी अच्छी बनती है. लेकिन बेरमो और दुमका की राजनीतिक जमीन पर भाजपा के लिए जीत दिलाने के बाद ही उनकी असली ट्यनिंग की परीक्षा होगी.
वैसे दोनों उपचुनाव दिलचस्प होने वाले हैं. कम से कम झारखंड में सियासत की एक नई इबारत तो लिखी ही जाएगी. इंतजार कीजिए, चंद दिन और बाकी हैं.

