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दानवीर सही भी हो ,जरूरी तो नहीं

by bnnbharat.com
July 28, 2020
in Uncategorized
दानवीर सही भी हो ,जरूरी तो नहीं
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सलिल सरोज
नई दिल्ली : कर्ण की छवि आज भी भारतीय जनमानस में एक ऐसे महायोद्धा की है जो जीवनभर प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ता रहा. बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि कर्ण को कभी भी वह सब नहीं मिला जिसका वह वास्तविक रूप से अधिकारी था. तर्कसंगत रूप से कहा जाए तो हस्तिनापुर के सिंहासन का वास्तविक अधिकारी कर्ण ही था क्योंकि वह कुरु राजपरिवार से ही था और युधिष्ठिर और दुर्योधन से ज्येष्ठ था, लेकिन उसकी वास्तविक पहचान उसकी मृत्यु तक अज्ञात ही रही. कर्ण को एक दानवीर और महान योद्धा माना जाता है. उन्हें दानवीर कर्ण भी कहा जाता है।भगवान् कृष्ण ने भी कर्ण को सबसे बड़ा दानी माना है। अर्जुन ने एक बार कृष्ण से पूछा की सब कर्ण की इतनी प्रशांसा क्यों करते हैं? तब कृष्ण ने दो पर्वतों को सोने में बदल दिया और अर्जुन से कहा के इस सोने को गांव वालों में बांट दो। अर्जुन ने सारे गांव वालों को बुलाया और पर्वत काट-काट कर देने लगे और कुछ समय बाद थक कर बैठ गए।तब कृष्ण ने कर्ण को बुलाया और सोने को बांटने के लिए कहा, तो कर्ण ने बिना कुछ सोचे समझे गांव वालों को कह दिया के ये सारा सोना गांव वालों का है और वे इसे आपस में बांट ले। तब कृष्ण ने अर्जुन को समझाया के कर्ण दान करने से पहले अपने हित के बारे में नहीं सोचता। इसी बात के कारण उन्हें सबसे बड़ा दानवीर कहा जाता है।

रश्मिरथी में रामधारी सिंह दिनकर ने बखूबी लिखा है कि प्रतिभा किसी भी जाति में बँध कर नहीं रह सकती,लेकिन छोटे जाती में पैदा होने का दंश हमेशा झेलते रहना पड़ता है  –
‘कौन जन्म लेता किस कुल में? आकस्मिक ही है यह बात,
छोटे कुल पर, किन्तु यहाँ होते तब भी कितने आघात!
हाय, जाति छोटी है, तो फिर सभी हमारे गुण छोटे,
जाति बड़ी, तो बड़े बनें, वे, रहें लाख चाहे खोटे।’

अपनी विपत्तियों का जवाब ढूँढने कर्ण जब कृष्ण के पास पहुँचते हैं तो वह संवाद कई अनछुए पहलुओं पर से पर्दा उठाता है।

कर्ण: हे कृष्ण, जन्म लेते ही मेरी माँ ने मुझे छोड़ दिया, गरीब घर में होते हुए भी मैं शूरवीर पैदा हुआ तो इसमें मेरा क्या दोष है? गुरु द्रोणाचार्य ने पांडवों और कौरवों को शिक्षा दी लेकिन मुझे शिक्षा नहीं दी क्यूंकि मैं क्षत्रिय नहीं था। मैंने परशुराम से शिक्षा ली, लेकिन यह जानने के पश्चात् की मैं क्षत्रिय नहीं हूँ, मुझे सब शिक्षा भूल जाने का श्राप दिया। द्रौपदी के स्वयंवर में मेरा सिर्फ इसलिए अपमान हुआ क्यूंकि मैं क्षत्रिय नहीं था। मेरी माता ने भी सिर्फ अपने पांच पुत्रों की रक्षा करने के लिए यह सत्य बताया की मैं उनका पुत्र हूँ। जो कुछ आज मैं हूँ वो सब दुर्योधन की देन है। तो फिर मैं उसके पक्ष में युद्ध करके भी क्यों गलत हूँ?

श्री कृष्ण : हे कुंती पुत्र कर्ण, हाँ तुम्हारे साथ बहुत बुरा हुआ। लेकिन मेरी कहानी तुमसे कुछ ज्यादा अलग नहीं है। मेरा जन्म कारागार में हुआ और जन्म के तुरंत बाद ही माँ बाप से बिछड़ गया।मेरी मृत्यु जन्म से पहले ही तय कर दी गयी। तुम कम से कम धनुष वाण और घोड़े और रथ के साथ खेलते हुए बड़े हुए, लेकिन मैं गाय, बछड़े, गोबर और झोपडी में बड़ा हुआ। चलना सीखने से पहले ही मुझ पर कई प्राणघातक हमले हुए. कभी पूतना तो कभी बकासु। मैं सोलहवें साल में गुरु संदीपनी के पास शिक्षा लेने जा पाया। लेकिन हमेशा ही लोगों को यह लगता था की मैं उनके कष्ट हरने के लिए पैदा हुआ हूँ। तुमने कम से कम अपने प्रेम को पा लिया और उस कन्या से विवाह किया जिसे तुम प्रेम करते थे। लेकिन मैं अपने प्रेम को विवाह में नहीं बदल पाया। और तो और  मुझे उन सब गोपियों से विवाह करना पड़ा जो मुझसे प्रेम करती थी या जिन्हें मैंने राक्षसों से मुक्त कराया। इतना सब कुछ होने के बावजूद तुम शूरवीर कहलाये जबकि मुझे भगोड़ा कहा गया। इस महाभारत के युद्ध में अगर दुर्योधन जीता तो तुम्हें इसका बड़ा श्रेय मिलेगा लेकिन अगर पांडव युद्ध जीते भी तो मुझे क्या मिलेगा। सिर्फ यही की इतने विनाश का कारण मैं हूँ। इसलिए हे कर्ण! हर किसी का जीवन हमेशा चुनौतियों भरा होता है। हर किसी के जीवन में कहीं न कहीं अन्याय होता है। न सिर्फ दुर्योधन बल्कि युधिष्ठिर के साथ भी अन्याय हुआ है। किन्तु सही क्या है ये तुम्हारे अंतर्मन को हमेशा पता होता है। इसलिए हे कर्ण अपने जीवन में हुए अन्याय की शिकायत करना बंद करो और खुद का विवेचन करो। तुम अगर सिर्फ जीवन में अपने साथ हुए अन्याय की वजह से अधर्म के रास्ते पर चलोगे तो यह सिर्फ तुम्हें विनाश की तरफ ले जाएगा। अधर्म का मार्ग केवल और केवल विनाश की तरफ जाता है।

कुछ मतों के अनुसार कर्ण अपने पूर्व जन्मों का ही पाप भोग रहा था और इसलिए उसे हर प्रकार की बाधा का सामना करना पड़ा। सहस्रकवच नामक राक्षस के नाम का वर्णन पुराणों में मिलता है। यह इतना खतरनाक असुर था कि स्वयं भगवान विष्णु को इसके अंत के लिय नर और नारायण के रूप में जन्म लेना पड़ा था। असल में हुआ ये था कि दंबोधव नाम के एक असुर ने सूर्यदेव की घोर तपस्या कि जिससे प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उसे वरदान मांगने को कहा इस पर दंबोधव ने उनसे 1000 रक्षा कवच मांग लिये और यह वरदान भी मांगा कि वही इन कवच को नष्ट कर सके जिसने हजारों साल तक तपस्या की हो। और साथ ही यह भी कहा कि अगर कभी कोई कवच को नष्ट करने में कामयाब हो भी जाये तो तुरंत उसकी मौत हो जाये। हजार कवच वाला होने के कारण दंबोधव ही सहस्रकवच हुआ। इसके बाद उसके ऋषि-मुनियों से लेकर जीव-जन्तुओं तक पर उसके अत्याचार बढ़ गये जिस कारण भगवान विष्णु को स्वंय इसका अंत करने के लिये हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने नर व नारायण के रूप में लगातार बारी-बारी से आक्रमण कर उसके 999 कवच धवस्त कर दिये अब केवल एक कवच शेष था कि उसने सूर्यलोक में सूर्यदेव की शरण ली। नर उसकी हत्या के लिये उसके पिछे-पिछे सूर्यलोक पंहुच गये। तब सूर्यदेव ने उनसे उनकी शरण में आये को बख्शने की याचना की। इस पर नर ने अगले जन्म में उन दोनों को इसका दंड भुगतने का श्राप दिया।मान्यता है कि सूर्यपुत्र कर्ण के रूप में दंबोधव नामक असुर ने ही कुंती की कोख से जन्म लिया। उसका बचा हुआ एक कवच और कानों में कुंडल जन्म के समय से उसके साथ थे। इनके रहते कर्ण को मार पाना असंभव था। इसलिये इंद्र जो कि अर्जुन के पिता भी थे ने अर्जुन की सहायता के लिये ब्राह्मण के भेष में सूर्य उपासना के दौरान कर्ण से उसके कवच व कुंडल को दान स्वरूप मांग लिया। हालांकि इंद्र के इस षड़यंत्र से सूर्यदेव ने कर्ण को अवगत भी करवा दिया था लेकिन कर्ण सूर्य उपासना के दौरान किसी के कुछ भी मांगने पर उसे देने के लिये स्ववचनबद्ध था। इसलिये उसने मना नहीं किया। साथ ही गुरु परशुराम, धरती माता, गऊ आदि द्वारा दिये गये श्रापों के कारण ही कर्ण युद्धभूमि में असहाय हो गया और अर्जुन उसका वध करने में सक्षम हो सका।

कर्ण को मित्र बनाकर दुर्योधन ने उसे अंग प्रदेश का नरेश भी बनाया जिसने उसकी प्रतिभा को निखारने और दिखाने का उत्तम स्थान प्रदान किया। दुर्योधन के लिए कर्ण साँसों में आती जाती हवा की तरह था और जिसके भरोसे दुर्योधन महाभारत जैसे युद्ध के लिए तैयार हो गया था ,परन्तु कर्ण के पास जितनी क्षमताएँ थी , उसका सही उपयोग नहीं हो पाया।  एक सूतपूत के राजा बनने के बाद भी कर्ण ने कभी दूसरे सूतों  को उठाने का काम नहीं किया।  हालाँकि इसका उत्तर हो सकता है कि अंग स्वत्नत्र प्रदेश नहीं था अतः दुर्योधन के अनुमति के बिना यह करना असंभव था।  लेकिन कर्ण और दुर्योधन की दोस्ती ऐसी थी कि कर्ण,दुर्योधन की पत्नी भानुमति के साथ अकेले कमरे में बैठ कर शतरंज खेल सकता था और इस बात से दुर्योधन को कभी आपत्ति नहीं हुई।  तो आखिर क्या वजह थी कि कर्ण कभी भी भुक्तभोगी होकर और एकलव्य की कहानी जानने  के बाद भी  जाति -व्यवस्था पर चोट नहीं कर पाया ? दुर्योधन की दोस्ती उसकी अपनी विवेक शक्ति पर हावी हो गई थी या खुद राजा बन कर उसे सूत का दर्द दिखना ख़त्म हो गया।  कहते हैं कि किसी बलशाली को ग़ुलाम बनाना हो तो कोई पुरस्कार या उपहार दे दो और वह ज़िंदगी भर आपके अहसानों के तले दबा रहेगा। हालाँकि अंतिम क्षणों में उसके कौशल और दानवीरता से प्रसन्न श्रीकृष्ण ने तीन वरदान मांगने को कहा। ज्ञानी कर्ण ने पहले वरदान में कृष्ण से अगले जन्म में अपनी तरह के लोगों के उत्थान के लिए कुछ विशेष करने का वरदान मांगा क्योंकि सूतपुत्र होने के कारण ही पूरा जीवन उसे छल और दुखों का सामना करना पड़ा था। परन्तु जीवन रहते यह कार्य ,कर्ण कभी नहीं कर पाया।

कर्ण की दो पत्नियां हुईं और दोनों ही सूतकन्याएं थीं-दुर्योधन के विश्वास पात्र सारथी सत्यसेन की बहन रुषाली और राजा चित्रवत की बेटी असांवरी की दासी ध्यूमतसेन की सूत कन्या पद्मावती (जिसे लोगों ने सुप्रिया नाम भी दिया है। )  एक राजा से शादी के बाद भी दोनों पत्नियों को सूत की तरह ज़मीन पर सोना पड़ता था और उनकी तरह का ही जीवन गुजारना पड़ता था।  जब अपने घर में स्त्रियों की दशा में कर्ण सुधार नहीं ला पाए तो फिर समाज की अन्य महिलाओं की बात दूर की है। लोग कह सकते हैं कि समानता का भाव रखने के लिए कर्ण ने अपनी पत्नियों को ऐसा जीवन जीने दिया।  परन्तु हो तो यह भी सकता था कि औरों का जीवन  स्तर ऊँचा किया जाता ना कि दूसरों का नीचा। और यही गलती कर्ण ने भरी  द्रौपदी के साथ की।  धर्म का साथ ना दे कर अपने अधर्मी और नीच मित्र का साथ देने वाला भी अधर्मी ही होता है। विकर्ण के नीतियुक्त वचनों को सुनकर दुर्योधन के परम मित्र कर्ण ने कहा था , “विकर्ण! तुम अभी कल के बालक हो। यहाँ उपस्थित भीष्म, द्रोण, विदुर, धृतराष्ट्र जैसे गुरुजन भी कुछ नहीं कह पाये, क्योंकि उन्हें ज्ञात है कि द्रौपदी को हमने दाँव में जीता है। क्या तुम इन सब से भी अधिक ज्ञानी हो? स्मरण रखो कि गुरुजनों के समक्ष तुम्हें कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है।” भले ही कर्ण स्त्री का अपमान स्वयं के द्वारा होने से जीवन भर अपमानित रहा। पश्चाताप की अग्नि में वह जीवन भर जलता रहा। कर्ण कभी नहीं समझ पाया कि उसके जिह्वा ने किसी स्त्री का अपमान कैसे किया ? इसी अपराध बोध के कारण वह कभी द्रौपदी के सम्मुख खड़ा नहीं हो सका।

कर्ण दानवीर अवश्य थे लेकिन गलत भी थे.

 

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