चीन को जवाब: पार्ट-2
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इस आंदोलन को हमसभी को खुद से अंजाम तक पहुंचाना है
चीन को जवाब मुहिम शुरू करने वाले सोनम वांगचुक अपने इस मुहिम को आगे बढ़ाते हुए लोगों के सवालों का जवाब लेकर आये हैं. जिसमें उन्होंने बताया कि हमें किस तरह से चीनी उत्पादों को बायकॉट करना है, किस तरह से अपने वॉलेट के जरिये हमें चीन को मात देनी है. चीन का जवाब पार्ट-2 में लोगों द्वारा पूछे गये सवालों का जवाब सोनम वांगचुक ने बड़े ही बेबाक तरीके से दिया है. लोगों ने जो सवाल उनसे पूछे हैं और उन सवालों के जवाब हम आप तक हु-ब-हू पहुंचा रहे हैं.
सवाल: चीन में बने सामान के बिना कैसे काम चलायें, इसके विकल्प क्या हैं?
जबाव (वांगचुक): दोस्तों, हम चीनी सामान में डूबे जा रहे हैं, कुछ इस तरह से कि जैसे हमारे हाथ में कुछ नहीं है. एक शेर के माध्यम से उन्होंने वर्तमान हालात को बताया, ‘खरीदे कब तलक कोट पतलों पे रहन हम चीन से अपनी अय्यासी की गुर हालत यही कायम रही आयेंगे घुस्साल चीनी से कफन भी’ (घुस्साल का मतलब श्मशान में लाश जलने के बाद उस स्थान को साफ करने वाले व्यक्ति).
बहरहाल, जिंदगी प्योर इकोनॉमिक्स नहीं होती, सबकुछ पैसे से नहीं होता, कुछ उसुल भी होते हैं. अच्छा बुरे का कुछ फर्क भी होता है और हमारे तहजीब हमारे मजहब हमें यही सिखाते हैं कि कोई गुनाह या पाप से जुड़े चीजों से दूर रहें. समुदाय विशेष के लोगों को कुछ बंदिशें हैं जिन्हें लोग पालन भी करते हैं. अब जैन समुदाय को ही लें तो वे मांस तो दूर प्याज और लहसुन भी नहीं खाते हैं तो ऐसे में अगर वो सफर में जायें तो वे भूखे मर जायेंगे? जी नहीं, अगर दृढ़निश्चय हो, पक्का इरादा हो तो एक इकोसिस्टीम बन जाती है एक हालात बन जाते हैं. उस रास्तेे में जब हम बर्दाश्त, करके चलते हैं तो आप देखेंगे कि ऐसे भोजनालय, रेस्टोरेंट निकलेंगे जहां केवल जैन फूड ही सर्व किये जाते हैं तो कहने का मतलब है कि एक या दो साल में नया इकोसिस्टम बन जाता है. इसी तरह से हम चीन के सामान को भी गुनाह से जुड़ी समझें जैसा कि हमने कहा कि इसके पीछे अत्याचार है तो एक-दो साल में सारी दुनिया के देश और हमारे देश में ऐसी चीजें बनने लगेंगी. इसके बाद हमें याद भी नहीं होगा हम ये नहीं कर पायेंगे.
मैं कहता हूं कि बायकॉट मेड इन चाइना। ‘software in a week, hardware in a year. Hardware may be finished, products non essentials in a 2 year’ हम योजनाबद्ध तरीके से चल सकते हैं अगर हमारे अपने में सुझबूझ है. ऐसा नहीं है कि कल या परसों से ही हम सबकुछ बंद करें. हम ये कहें कि finished products वाले एक साल के भीतर हम बंद कर देंगे. जब तक हमारे पास विकल्प तैयार नहीं हो जाते तब तक हम इसे चलायेंगे. रिप्लेसमेंट की बात है इन चीनी सामानों की तो एक बात जरूरी है कि चीजों की हमें रिप्लेसमेंट की आवश्यकता भी नहीं होनी चाहिये. हमारी जिंदगी सादा भी हो सकती है. इस लॉकडाउन में हमने देखा कि कितनी कम चीजों से हम खुशी पा सकते हैं और सस्ते. माइंडलेस कंज्यूमरीज्म में लाये गये ये चीनी सामान जो हमें जरूरत भी नहीं है. 10 जोड़े जूते और 50 जोड़े जुराब की क्या जरूरत है. एक सादा जीवन हम नहीं जी सकते हैं. हम अपनी जिंदगी को बदल नहीं सकते हैं? हम यह निश्चय कर लें कि थोड़े में ही गुजारा करेंगे मगर साफ चीजों को ही अपने जीवन में जोड़ेंगे.
सवाल: हम इसे एक राष्ट्रीय आंदोलन कैसे बना सकते हैं?
जवाब (वांगचुक): देखिए, मैंने एक छोटी सी पहल की है. लद्दाख से ये मत उम्मीद कीजिएगा कि लद्दाख से कोई व्यक्ति इसको चलायेगा. इस बटुए के आंदोलन में हर नागरिक सिपाही है और ये उतना ही दूर तक चलेगा जितनी दूर आप इसे लेकर जायेंगे.

