जगदम्बा प्रसाद शुक्ल,
प्रयागराज: सावन का पवित्र माह प्रारंभ हो चुका है. वर्ष का यह महीना जहां देवाधिदेव महादेव भगवान शिव की आराधना के लिए जाना जाता है वहीं यह फिल्मी एवं लोकभाषा के गीतों के लिए भी महत्वपूर्ण है.
सावन की रिमझिम फुहारों के बीच गांवों में नीम के पेड़ पर डाले गये झूले पेंग मारकर कजरी गीत गाती हैं वहीं धान के खेतों में रोपाई करते समय लोकभाषा के गीत गाये जाते हैं.
सावन के महीने पर गाये जाने वाले गीतों ने फिल्मी दुनिया में भी गीतकारों के सम्मान को बढ़ाया है. सावन का महीना पवन करे शोर, सावन के झूले पड़े, आया सावन झूम के, रिमझिम गिरे सावन, तेरी दो टकिये की नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाए जैसे अनगिनत गीतों ने फिल्मी दुनिया का मान बढ़ाया है तो आम जनमानस पर भी अमिट छाप छोड़ा है.
ग्रामीण परिवेश में देखा जाय तो सावन की फुहार में कजरी का महत्व न केवल मानव प्रभावित है बल्कि समस्त जीवजंतु भी सावन की हरियाली में घुमड़ घुमड़ कर घेर रहे बादलों की उमंग से मदमस्त हो जाते हैं.
कजरी लोकसाहित्य की एक सशक्त विधा है जो सावन के महीने में गायी जाती है. कजरी लगभग हर क्षेत्र में गाया जाने वाला गीत है लेकिन इसका उदय स्थल मिर्जापुर माना जाता है. दसमी रामनगर का मेला, कजरी मिर्जापुर सरनाम.
कजरी में हर विधायें समाहित
कजरी गीत में सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, प्रकृति प्रेम, राष्ट्रप्रेम, पर्यावरणीय चेतना, मंहगाई, सामाजिक बुराइयां जैसी हर विधायें समाहित हैं वहीं नायिका की स्थिति, संयोग वियोग का पक्ष, परदेशी पति की वेदना, हास परिहास जैसे पक्ष भी इसके प्रमुख अंग हैं.
नायिका अपने पति से मेंहदी मंगाने के लिए हास परिहास करते हुए कहती है पिया मेंहदी लिया द मोती झील से जाइ के साइकील से ना वहीं भोला वास करें काशी में गउरा पारवती के संग जैसे गीत धार्मिक भावना को बढ़ाते हैं.
देशवा के खातिर भइया भइले सिपहिया लड़त होइहीं ना जैसे देशप्रेम की झलक मिलती है तो सइयां बिना नाही भावेला सवनवां जैसे बिरह गीत की प्रस्तुति भी कजरी के माध्यम से होती है.
धान की रोपाई का प्रमुख गीत
ग्रामीण क्षेत्र में सावन के महीने में धान की रोपाई करते समय महिलाएं समवेत स्वर में कजरी गीत गाती हैं. हम तउ कइले हई बीए की पढ़ाई हमसे धान ना रोपाई सजना एवं निहुरि निहुरि कइली धान की रोपनिया हेरायल पैजनिया उही खेतवा में जैसे गीत गाये जाते है तो वही पति द्वारा अबकी धनवा के होये जब रोपनिया गोरी, दिलाइ देब झुलनिया गोरी ना कहकर पत्नी को संतुष्ट करने का प्रयास करता है.
विलुप्त हो रही लोकभाषा गीतों की परंपरा
सावनी लोक परंपरा के गीतों द्वारा लोगों को नया उत्साह प्राप्त होता था, लेकिन भागदौड़ भरी जिंदगी, जीवन की आपाधापी तथा फिल्मी चकाचौंध के बीच लोकभाषा के गीतों का प्रभाव समाप्त होता जा रहा है. वहीं अब गांवों में नीम के पेड़ों पर पड़ने वाले झूलों का भी महत्व घटता जा रहा है.

