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282 वर्षों के इतिहास में पहली बार रांची के श्रीराम जानकी तपोवन मंदिर का कपाट नहीं खुला

by bnnbharat.com
April 2, 2020
in Uncategorized
282 वर्षों के इतिहास में पहली बार रांची के श्रीराम जानकी तपोवन मंदिर का कपाट नहीं खुला

282 वर्षों के इतिहास में पहली बार रांची के श्रीराम जानकी तपोवन मंदिर का कपाट नहीं खुला

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रांची: कोरोना वायरस कोविड-19 को लेकद देशव्यापी लॉकडाउन के बीच आज राजधानी रांची समेत राज्यभर में रामनवमी का त्योहार सादगी से मनाया जा रहा है. रामनवमी के मौके पर लोग घरों में पूजा अर्चना कर रहे हैं, वहीं महावीर मंदिरों में भी पुरोहितों द्वारा परंपरागत रीति-रिवाज के साथ पूजा अर्चना की गयी, लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग को बनाये रखने के लिए महावीर मंदिर के पट को नहीं खोला गया. इस बार लॉकडाउन के कारण राज्य के किसी भी हिस्से में रामनवमी का जुलूस नहीं निकाला जा रहा है.

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इधर,राजधानी रांची के निवारणपुर स्थित श्रीराम जानकी तपोवन मंदिर का भी कपाट नहीं खुला. मंदिर के 282 वर्षों के इतिहास में यह पहला मौका है, जब रामनवमी के दिन मंदिर का मुख्य द्वार बंद रहा.

बताया गया है कि लॉकडाउन के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ न लग जाए, इस कारण दर्शन के लिए आज कपाट नहीं खोला गया. इससे पहले मंदिर प्रबंध कमेटी ने श्रद्धालुओं से आग्रह किया था कि वह अपने अपने घरों में सुरक्षित रहें और श्री राम लला के जन्म के समय अपने घरों में दीप जलाएं. हनुमान चालीसा और श्री रामरक्षा स्तोत्र पाठ, जाप और आरती करें. जबकि मंदिर में पुजारियों द्वारा नियमित पूजा अर्चना जारी रहेगी. मंदिर का मुख्य द्वार राज्य सरकार के अगले आदेश तक बंद रखा जाएगा और किसी भी परिस्थिति में मंदिर में प्रवेश वर्जित होगा.

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ऐतिहासिक जानकारों के मुताबिक रांची स्थित प्राचीन तपोवन मंदिर का इतिहास दशकों पुराना है. उत्तर से मध्य भारत में रामनवमी के दिन राम की पूजा अर्चना की जाती है, लेकिन झारखंड में रामनवमी के दिन रामभक्त हनुमान की पूजा ही नहीं, बल्कि कई जगहों पर विशाल महावीरी झंडों के साथ शोभायात्रा और जुलूस निकाले जाते हैं. अखाड़ों में सुबह पूजा अर्चना के बाद विशाल महावीरी पताकाओं के साथ जुलूस निकाले जाते हैं.

ढोल नगाड़ों की गूंज के बीच विभिन्न अखाड़ों के जुलूस एक दूसरे से मिलते हुए विशाल शोभायात्रा के रूप में तपोवन मंदिर पहुंचते हैं. यहां पहली बार 1929 में उस झंडे की पूजा हुई थी, जो महावीर चौक के प्राचीन हनुमान मंदिर से वहां ले जाया गया था. तत्कालीन महंत बंकटेश्वर दास ने जुलूस का स्वागत और झंडे का पूजन किया था. उसी दिन से यह परंपरा शुरू हुई. लेकिन 90 वर्षों के बाद यह सिलसिला कोविड-19 के कारण टूटा है. इसके बावजूद शहर में लोगों ने घर-घर परंपरागत तरीके से पूजा अर्चना कर महावीरी पताका फहराया.

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