Ranchi:- एडुटेनमेन्ट शो ‘मैं कुछ भी कर सकती हूँ’से प्रेरणा लेकर प्रजनन स्वास्थ्य विषय की चैंपियंस बनी लड़कियाँ , लोगों को कर रहीं शिक्षित
एडुटेनमेंट शो ‘मैं कुछ भी कर सकती हूँ ’(एमकेबीकेएसएच) की विरासत का लगातार आगे बढ़ना जारी है. खासकर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में नजरिए में बदलाव और जागरूकता फैलाने में यह शो अहम भूमिका निभा रहा है. हाल ही में, शो ने गर्भनिरोधक और परिवार नियोजन के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए झारखंड के बोकारो जिले के नवाडीह गांव में लड़कियों के एक समूह को प्रेरित किया है.
प्रजनन स्वास्थ्य, अपने अधिकारों, परिवार नियोजन और गर्भनिरोध जैसे मुद्दों के बारे में जानकारी की कमी और इनके बारे में बात न करना जैसी परेशानियों को देखते हुए, लड़कियों का जागरूक पैदा करने के लिए बाहर निकलना भारत में एक असामान्य और अनूठी घटना है. एमकेबीकेएसएच की वजह से वृहद स्तर पर युवा पीढ़ी न सिर्फ इन विषयों के बारे में खुद को शिक्षित कर रही है, बल्कि इन महत्वपूर्ण जानकारियों को दूसरों तक भी पहुंचा रही है.
आप इस लिंक पर कहानी को देख सकते हैं- https://www.youtube.com/watch?v=UKu6EPPD784&feature=youtu.be
ऐसी ही एक चेंजमेकर हैंं नवाडीह की 21 वर्षीय लवली कुमारी, वे कहती हैं, ” इस शो ने हमें परिवार नियोजन और कई अन्य चीजों के बारे में बताया. हमने जाना कि किसी को भी 18 साल की उम्र के बाद ही शादी करनी चाहिए, शादी के कम से कम दो साल बाद ही बच्चे के बारे में सोचना चाहिए और पहले व दूसरे बच्चे के बीच कम से कम तीन साल का अंतर होना चाहिए. पहले, परिवार नियोजन को लेकर बात नहीं होती थी. दूसरों को इन विषयों के बारे में जानकारी देने के लिए हमारे पास पर्याप्त जानकारी नहीं थी. धारावाहिक ‘मैं कुछ भी कर सकती हूँ’ ने हमें लोगों को बताने के लिए जानकारी और आत्मविश्वास दिया. अब हम महिलाओं से गर्भनिरोधक विकल्पों के बारे में बात करते हैं और वे अपने पतियों से बात करती हैं.”
21 वर्षीय गुड़िया कुमारी कहती हैं, “एमकेबीकेएसएच से हमने विभिन्न गर्भनिरोधक विकल्पों के बारे में भी जाना. उदाहरण के लिए, अब मुझे पता है कि कॉपर टी का उपयोग पांच साल तक के लिए किया जाता है, इंजेक्टेबल कॉन्ट्रासेप्टिव एमपीए (अंतरा प्रोग्राम के तहत) को हर तीन महीने में इंजेक्ट(लगाया) किया जाता है और छाया गोलियों को सप्ताह में दो बार लिया जाता है और इसके लिए अलावा कंडोम का भी इस्तेमाल किया जाता है.”
गाँव की एक आशा कार्यकर्ता, 50 वर्षीय मंजू कुमारी कहती हैं, “कंडोम के उपयोग में बढ़ोतरी हुई है. अस्पताल के प्रवेश द्वार पर एक बॉक्स लगा है जहाँ कंडोम्स रखे गए हैं. हमने नोटिस किया है कि बॉक्स काफी जल्दी ही खाली हो जाता है. जिस वजह से अस्पताल में कंडोम्स की कमी है! “
इस बारे में पीएफआई की कार्यकारी निदेशक पूनम मुत्तरेजा कहती हैं, ‘सीरीज़ के असर के जमीनी रिपोर्ट्स को देखना रोमांचक से भर देने वाला है. ‘मैं कुछ भी कर सकती हूँ’ ने न सिर्फ़ लोगों के नजरिए को बल्कि उनके बातचीत के तरीके को बदल दिया है और लोगों को विकल्प उपलब्ध कराए हैं जो जानकारीपरक और सकारात्मक हैं. हम जिन लोगों तक पहुंच रहे हैं, जब वे खुद ही बदलाव के चैंपियन बन जाते हैं, तो हम इससे ज्यादा और क्या उम्मीद कर सकते हैं? “

