जमशेदपुर: जमशेदपुर में मजदूरों का शोषण जारी है. सरकार बदली, सत्ता बदली मगर नहीं बदला मजदूरों का शोषण. टाटा समूह का एक खौफनाख चेहरा फिर सामने आया है. आपको बता दें कि साल 2013- 2014 में जूम वल्लभ के नाम से एक कंपनी गम्हरिया में उद्योग लगाने का प्रस्ताव लेकर आई. उस कंपनी ने दुग्ध इलाके में उद्योग लगाने के नाम पर 117 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया, जिसके तहत कंपनी प्रबंधन द्वारा 350 जमीनदाताओं के साथ जमीन के बदले नौकरी देने का एग्रीमेंट किया गया.
साल 2017 में जूम वल्लभ खुद को घाटे में दिखाकर हाथ- पांव समेटने में जुट गई. अंततः जूम वल्लभ ने पूर्व के उषा मार्टिन ग्रुप को कंपनी बेच दिया. उधर उषा मार्टिन ने जमशेदपुर प्लांट टाटा स्टील को बेच दिया. इस प्रक्रिया के तहत जमीनदाताओं के साथ लुका- छिपी का खेला जारी रहा. न मजदूरों को स्थायी नौकरी मिली न एग्रीमेंट के हिसाब से मुआवजा. अंततः आज 36 मजदूरों को बगैर किसी पूर्व सूचना के टाटा स्टील द्वारा अधिग्रहित उषा मार्टिन प्लांट से यह कहते हुए बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, कि आपको अगर काम करना है तो आप उषा मार्टिन ने दादर नगर हवेली के सिलवासा स्थित प्लांट में जाकर योगदान दें. अन्यथा यहां आपके लिए काम नहीं है. आपलोगों ने जमीन उषा मार्टिन को दी है, आप वहीं जाएं.
मामले को जानकर हैरान परेशान मजदूर आंदोलित है. उनके सामने एक तरफ कूआं, तो दूसरी तरफ खाई… बड़ा सवाल ये है, कि झारखंड में सत्ता परिवर्तन होने के बाद भी मजदूरों के साथ अमानवीय वर्ताव जारी है. फिर सत्ता परिवर्तन का क्या मतलब रह जाता है. पूर्व की रघुवर सरकार में जो स्थिति थी मजदूरों के साथ वैसी ही आज भी जारी है.
रघुवर सरकार के कार्यकाल में टायो कंपनी के मजदूरों के साथ ऐसा ही हुआ था. हेमंत सरकार के कार्यकाल में भी ऐसा ही हो रहा है. एक साल के भीतर झारखंड की औद्योगिक नगरी जमशेदपुर और आदित्यपुर के लाखों मजदूर बेरोजगार हुए हैं. दो सौ से अधिक कंपनियां बंद हो चुकी है. जो बचे हैं, वो भी दम तोड़ने की स्थिति में पहुंच चुके हैं. ऐसे में सरकार पर सवाल उठना लाजिमी है. फिलहाल मजदूर आंदोलित हैं. वैसे मजदूर समझ चुके हैं, कि उनका हस्र क्या होनेवाला है ?

