लखीसराय: वर्ष 2015 से ही नियोजित शिक्षकों के लिए सेवाशर्त निर्धारण के लिए गठित कमेटी का कैबिनट बैठक में पुनर्गठन की स्वीकृति मिलने पर “अनुसूचित जाति, जनजाति शिक्षक संघ बिहार”प्रदेश अध्यक्ष-अमित कुमार ने बयान जारी करते हुए इसे शिक्षकों के साथ छलावा करार दिया है.
उन्होंने कहा कि सरकार को नए सेवाशर्त के लिए कमिटी के पुर्नगठन के बजाय नियोजित शिक्षकों को नियमित शिक्षकों की भांति वेतनमान एवं सेवाशर्त की घोषणा करें.
सेवाशर्त के नाम पर कमेटी का पुर्नगठन वास्तव में समाज का ध्यान भटकाने की साजिश है. जिससे सरकार यह दिखा सके कि वे शिक्षकों के प्रति संवेदनशील है, लेकिन यह बड़ी विडंबना है कि जिस कमेटी का गठन तीन महीने के सेवाशर्त का निर्धारण करने के लिए हुआ था वह पिछले पांच वर्ष में मात्र शिक्षकों के आंख में धूल झोंकने के अतिरिक्त कोई कार्य नहीं कर पाई.
आगे उन्होंने कहा कि विगत समय मे हमारे राष्ट्र में एक विशेष वर्ग को बंधुआ मजदूर कहा जाता था जिनके साथ हुआ शोषण किसी से छिपा नही है और वर्तमान में वही हालात नियोजित शिक्षकों की हो गई, जिनसे काम तो कई सारे लिए जाते है. लेकिन जब उनके अधिकार की बारी आती है, तब विभाग और सरकार कान में रुई देकर सो जाती है.
सरकार न केवल शिक्षकों के साथ छल कर रही है. अपितु बिहार के बच्चों के साथ-साथ आने वाले भविष्य को भी अंधेरे में धकेलने का कार्य कर रही है.
78 दिन के ऐतिहासिक हड़ताल के बाद जब सरकार द्वारा यह आश्वस्त किया गया था कि स्तिथि सामान्य होते ही “बिहार राज्य शिक्षक संघर्ष समन्वय समिति” के घटक संघ के सभी राज्य अध्यक्ष मण्डल सदस्यों के साथ वार्ता की जाएगी, लेकिन अभी तक सरकार और विभाग ने चूप्पी साध रखी है.
वहीं दूसरी ओर फिक्सेशन में गड़बड़ी के नाम पर लाखों शिक्षकों के वेतन कटौती का कार्य करने लगी है. अब सरकार सेवाशर्त कमिटी का पुनर्गठन करके सेवाशर्त को चुनाव तक टालना चाहती है, जिसे बिहार के शिक्षक भलीभांति समझ रहे है.
