सतीश बहादुर सिंह,
रांची: देश में कोरोना वायरस का संक्रमण जिस तेजी से फैल रहा है, उसे देखते हुए फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि हमारा देश भी यूरोप और अमेरिका बनने की राह पर है, पर यहां यह बात भी याद रखने योग्य है कि जिस तरह की स्वास्थ्य सुविधाएं अमेरिका और यूरोपीय देशों में उपलब्ध है उसमें हमारा देश काफी पीछे है.
जब इस महामारी ने स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में दूसरा स्थान रखने वाला इटली और विश्व शक्ति अमेरिका को घुटने टेकने पर विवश कर दिया तो आने वाले समय में भारत की स्थिति क्या होगी इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. इस भयंकर विपदा के समय भी शायद हम सब अपने कर्तव्यों को सही से नहीं निभा रहे हैं और यह शायद भारत का दुर्भाग्य भी रहा है. इतिहास गवाह रहा है हम भारतीय हर विपदा में अपने स्वार्थ सिद्धि में ही लिप्त रहते हैं. 1000 वर्षों से भी ज्यादा समय तक गुलाम रहने के बावजूद हमने इतिहास से कोई सबक नहीं लिया है.
इस भयंकर महामारी में जब पूरे विश्व के नेता और बुद्धिजीवी एकजुट होकर इससे लड़ने और बचाव के तरीके निकालने के लिए प्रयासरत हैं. हम भारतीय अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिनको आज पूरा विश्व समुदाय बेहतरीन नेतृत्वकर्ता मान रहा है, उनकी बातों को नजरअंदाज कर रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस दूरदर्शी सोच के तहत देश में 21 दिनों का पहला लॉक डाउन लगाया था. अगर सभी देशवासियों और नेताओं ने उनका साथ दिया होता तो अभी तक हम कोरोना वायरस को अपने देश से भगा चुके होते, पर दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में नेताओं की स्थानीय राजनीति हावी रही.
जिसके कारण प्रवासी मजदूरों को अफवाह फैला कर भरमाया गया और अपने अपने पैतृक निवास स्थान पर जाने के लिए उकसाया गया. कई स्थानों पर तो बाकायदा कोरोना से जागरूकता फैलाने के लिए उपयोग में लाए गए वाहनों से ही इस तरह के भ्रम फैलाए गए. शायद इन महानगरों के स्थानीय नेताओं और प्रशासन ने क्षणिक लाभ के लिए ऐसा किया हो पर इसके परिणाम दूरगामी निकलेंगे. शायद स्थानीय नेताओं कि यह सोच रही होगी कि इतनी बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों के राशन वगैरह की व्यवस्था की परेशानी से बचा जाए पर इन नेताओं की इसी छोटी सोच ने पूरे देश को ही मुसीबत में डाल दिया.
अगर हमने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात “जो जहां है वहीं रुक जाए” पर अमल किया होता तो आज आसानी से देश में कल कारखाने भी खोले जा सकते थे. क्योंकि उस स्थिति में सभी मजदूर अपने अपने कार्य स्थल के समीप ही रहते. ऐसी स्थिति में संक्रमण का खतरा भी कम होता और बहुत हद तक हम अभी तक इस महामारी को अपने देश से भगा चुके होते.
यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि जिस व्यक्ति को विश्व शक्ति अमेरिका का राष्ट्रपति तक विशेष सम्मान देता है. उसे अपने ही देश के लोग व्यक्तिगत और राजनीतिक स्वार्थ के कारण उसकी कार्यशैली और दुर्गामी क्षमता को नकारने में कोई कसर नहीं छोड़ते.

