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सौभाग्य का प्रतीक है हरितालिका तीज का व्रत

by bnnbharat.com
August 21, 2020
in Uncategorized
सौभाग्य का प्रतीक है हरितालिका तीज का व्रत
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जगदम्बा प्रसाद शुक्ल,

प्रयागराज: हरितालिका तीज का व्रत भादो महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है. इस वर्ष यह पर्व शुक्रवार को मनाया जा रहा है. इस व्रत को सुहागन स्त्रियां अपने सुहाग को अखंड बनाए रखने तथा कुवांरी युवतियां अपने मन के अनुसार वर पाने के लिए करती हैं.

यह पर्व उत्तर प्रदेश व बिहार में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है. यह व्रत स्त्रियों के लिए करवा चौथ से भी कठिन होता है क्योंकि करवा चौथ में शाम को चांद दिखने के बाद व्रत का समापन कर दिया जाता है जबकि तीज का व्रत पूरे दिन निर्जला रहकर रखा जाता है और अगले दिन विधि विधान से पूजा करने के बाद ही तोड़ा जाता है.

ऐसी मान्यता है की हरितालिका तीज का व्रत सबसे पहले माता पार्वती ने शिव शंकर के लिए रखा था. इसलिए इस व्रत में सर्वप्रथम गौरी शंकर का ही पूजन किया जाता है इस व्रत को रखने वाली स्त्रियां पार्वती जी के ही समान मनोवांछित वर व सुख प्राप्त करती हैं तथा सुख भोग कर अपने पति के साथ अंत में शिवलोक गमन करती है.

व्रत करने का विधान

आचार्य दीप नारायण पांडेय के अनुसार यह व्रत पार्वती और शिवजी के पुनर्मिलन के उपलक्ष में रखा जाता है. इस व्रत में व्रत करने वाली स्त्रियों को स्नान करके सबसे पहले पूजा स्थल की सफाई करना चाहिए. उसके बाद मिट्टी का शिवलिंग तथा मां पार्वती और गणेश जी की मूर्ति बनाना चाहिए. भगवान शिव का गंगाजल से अभिषेक करके उन्हें भांग, धतूरा, बेलपत्र, सफेद चंदन, पुष्प, फल आदि अर्पित करके ओम नमः शिवाय मंत्र का जाप करना चाहिए.

मां पार्वती को अक्षत, सिंदूर, धूप, दीप, फल, फूल, सुहाग की सामग्री आदि चढ़ाना चाहिए. इसके बाद विघ्नहर्ता गणेश जी की भी पूजा करके हरितालिका व्रत की कथा का पाठ करना चाहिए. अंत में आरती करके क्षमा याचना करना चाहिए. विधि विधान से व्रत करके व्रत करने वाली महिलाओं को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है.

व्रत की कठिनता

मान्यता के अनुसार कुंवारी कन्या या सुहागिन स्त्रियां जब इस व्रत का प्रारंभ करती हैं तो उन्हें जीवन पर्यंत इस व्रत को रखना पड़ता है. यदि व्रत के समय महिला बीमार होती है और व्रत रखने में सक्षम नहीं होती तो ऐसी परिस्थिति में उसके बदले में उसका पति या निकट संबंधी उस व्रत को रख सकता है. विशेष परिस्थिति में इस व्रत को रखने वाली महिलाओं को उद्यापन करने के बाद पानी पीने का विधान बताया गया है प्रत्येक सौभाग्यवती स्त्रियां इस व्रत को रखने में अपना परम सौभाग्य समझती हैं.

 

 

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