नियम कानून को ताक में रखकर खुलेआम हजारीबाग वन परिक्षेत्र में लाल फ़ीताशाही चल रहा है।
हजारीबाग परिक्षेत्र में कैसे वन विभाग के नियम कानून को ताक में रखकर मन के पसंद के अनुसार मनमर्जी किया जा रहा है और जिसको जो मन आए कर रहा है। यहां आरसीएफ, सीएफ और डीएफओ सब अपने मन के हिसाब से कार्य कर रहे हैं।
वन संरक्षक (सीएफ) के द्वारा 30 नवंबर 2024 को गठित दो सदस्यीय जांच कमिटी ने 27 फरवरी 2025 को वन संरक्षक,हजारीबाग को अंतरिम जांच प्रतिवेदन सौंपा । इस जांच प्रतिवेदन को प्राप्त करने के लगभग पांच महीने बाद वन संरक्षक की अचानक नींद खुली और उनके द्वारा 22 जुलाई को दो पत्र जारी किया जाता है। अपने पहले पत्र संख्या 1425 में उनके द्वारा उसी अधिकारी (डीएफओ) मौन प्रकाश को जांच समिति के सदस्यों से स्पष्टीकरण पूछने का निर्देश दिया जाता है जिनके खिलाफ उनको शिकायत प्राप्त हुई थी, और जिनके खिलाफ जांच के लिए उनके द्वारा कमिटी बनाई गई थी और कमिटी ने उनके खिलाफ आरोपों की पुष्टि किया था। दूसरे पत्र संख्या 1426 में उनके द्वारा जांच समिति से अपने अंतरिम जांच प्रतिवेदन की समीक्षा कर अंतिम जांच प्रतिवेदन का मांग किया गया । लेकिन किस बिंदु पर किस आधार तथा साक्ष्य पर क्या समीक्षा करना है उसका कोई जिक्र उस पत्र में नहीं किया गया। (इसका सीधा मतलब है कि आप अपने रिपोर्ट को बदलिए) इस तरह उनके द्वारा एक ही दिन दो तरह के आपसी विरोधाभासी पत्र जारी किया जाता है। जिससे समझा जा सकता है कि उनकी मानसिकता क्या है ?
अब उसी मामले में हजारीबाग परिक्षेत्र के सबसे बड़े अधिकारी क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक रविन्द्र नाथ मिश्रा की इंट्री होती है। वन संरक्षक के 22 जुलाई को दो विरोधाभाषी पत्र जारी होने के एक दिन बाद उनके कार्यालय पत्रांक 1442 दिनांक 23/07/2025 के द्वारा वन संरक्षक हजारीबाग और पश्चिमी/पूर्वी वन प्रमंडल हजारीबाग के माध्यम से जांच कमिटी के सदस्यों को स्पष्टीकरण पूछने का निर्देश जारी किया जाता है । अब सवाल उठता है कि क्या क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक को वन संरक्षक ने जांच समिति के अंतरिम जांच प्रतिवेदन को समीक्षा कर क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक को भेजा था ? क्या जांच समिति के अंतरिम जांच प्रतिवेदन पर किसी प्रकार का कोई साक्ष्य जनक प्रमाणित हुआ था कि उनके द्वारा गलत तरीके से अंतरिम जांच प्रतिवेदन बनाया गया था ? आखिर किस आधार क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक रविन्द्र नाथ मिश्रा के द्वारा स्पष्टीकरण जारी किया गया है ? जो वन संरक्षक के माध्यम से जांच समिति को स्पष्टीकरण जारी किया ? उसके पूर्व उनके द्वारा वन संरक्षक से रिपोर्ट प्राप्त हुआ या बिना वन संरक्षक के टिप्पणी/आपत्ति के कैसे उस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जांच समिति ने गलत रिपोर्ट दिया है ? और वन संरक्षक द्वारा पांच महीने तक जांच समिति के अंतरिम जांच रिपोर्ट को दबाए रखने पर क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक ने किसी प्रकार का कोई स्पष्टीकरण वन संरक्षक से नहीं किया ? क्यों नहीं किया और अचानक वो भी क्यों रेस हो गए उसका मतलब जांच रिपोर्ट में दोषी पाए गए आरोपियों को बचाने एवं स्वयं बचने का कयास लगाया जा रहा है ।
अब आते हैं डीएफओ मौन प्रकाश की भूमिका पर..जिनके खिलाफ शिकायत हुई,जिनके ख़िलाफ़ जांच समिति बनाई गई और जिनके खिलाफ जांच रिपोर्ट पुष्टि हुई उनकी भूमिका पर..
जांच समिति के रिपोर्ट प्राप्त होने की खबर जैसे ही डीएफओ मौन प्रकाश को मिला,उनके द्वारा स्वयं के कार्यालय स्तर पर क्यों और किस परिस्थिति में जांच समिति से स्पष्टीकरण पूछा गया,जवाब मिलने पर समीक्षा किया गया और उसको खारिज कर कार्रवाई के लिए आदेश संख्या 79 जारी भी कर दिया गया । क्या यह डीएफओ के अधिकार क्षेत्र का मामला है ? या उनके वरीय अधिकारी सीएफ का ? क्या डीएफओ मौन प्रकाश ने अपने वरीय अधिकारी के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं किया ? जबकि वह जांच कमिटी उनके खिलाफ बनाया गया था और अपने ही खिलाफ जांच कमिटी की रिपोर्ट की समीक्षा करने के मामले में क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक द्वारा कोई संज्ञान लिया गया या नहीं ?

