BnnBharat | bnnbharat.com |
  • समाचार
  • झारखंड
  • बिहार
  • राष्ट्रीय
  • अंतर्राष्ट्रीय
  • औषधि
  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी करेंट अफेयर्स
  • स्वास्थ्य
No Result
View All Result
  • समाचार
  • झारखंड
  • बिहार
  • राष्ट्रीय
  • अंतर्राष्ट्रीय
  • औषधि
  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी करेंट अफेयर्स
  • स्वास्थ्य
No Result
View All Result
BnnBharat | bnnbharat.com |
No Result
View All Result
  • समाचार
  • झारखंड
  • बिहार
  • राष्ट्रीय
  • अंतर्राष्ट्रीय
  • औषधि
  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी करेंट अफेयर्स
  • स्वास्थ्य

हूल दिवस: अंग्रेजों के छक्‍के छुड़ाने वाले आदिवासियों के संघर्ष गाथा को याद करने का खास दिन

by bnnbharat.com
June 30, 2020
in समाचार
हूल दिवस: अंग्रेजों के छक्‍के छुड़ाने वाले आदिवासियों के संघर्ष गाथा को याद करने का खास दिन
Share on FacebookShare on Twitter

रांची:  संथाल की हूल क्रांति को आजादी की पहली लड़ाई मानी जाती है. 30 जून 1855 को क्रांतिकारी नेता सिदो और कान्हू मुर्मू के आह्वान पर राजमहल के भोगनाडीह में 20 हजार संथालों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह किया था. शहीद सिदो-कान्हू, चांद-भैरव को नमन है.

हूल दिवस, हूल क्रांति, संथाल विद्रोह, जैसा कि शब्दों से ही स्पष्ट है कि आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के छक्‍के छुड़ाने वाले आदिवासियों के संघर्ष गाथा और उनके बलिदान को याद करने का यह खास दिन है.

30 जून 1855 को झारखंड के आदिवासियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका और 400 गांवों के 50000 से अधिक लोगों ने भोगनाडीह गांव पहुंचकर जंग का एलान कर दिया. यहां आदिवासी भाइयों सिद्धो-कान्‍हो की अगुआई में संथालों ने मालगुजारी नहीं देने के साथ ही अंग्रेज हमारी माटी छोड़ो का एलान किया. इससे घबराकर अंग्रेजों ने विद्रोहियों का दमन प्रारंभ किया.

अंग्रेजी सरकार की ओर से आए जमींदारों और सिपाहियों को संथालों ने मौत के घाट उतार दिया. इस बीच विद्रोहियों को साधने के लिए अंग्रेजों ने क्रूरता की हदें पार कर दीं. बहराइच में चांद और भैरव को अंग्रेजों ने मौत की नींद सुला दिया तो दूसरी तरफ सिद्धो और कान्हो को पकड़कर भोगनाडीह गांव में ही पेड़ से लटकाकर 26 जुलाई 1855 को फांसी दे दी गई. इन्हीं शहीदों की याद में हर साल 30 जून को हूल दिवस मनाया जाता है. इस महान क्रांति में लगभग 20000 लोगों को मौत के घाट उतारा गया. एक अंग्रेज इतिहासकार हंटर ने लिखा है कि आदिवासियों के इस बलिदान को लेकर कोई भी अंग्रेज सिपाही ऐसा नहीं था जो शर्मिंदा न हुआ हो.

आदिवासियों के लिए बना बंदोबस्‍त अधिनियम

हूल क्रांति जनवरी 1856  में समाप्त हुआ, तब संथाल परगना का निर्माण हुआ जिसका मुख्यालय दुमका बना. इस महान क्रांति के बाद वर्ष 1900 मे मैक पेरहांस कमेटी ने आदिवासियों के लिए बंदोबस्त अधिनियम बनाया. जिसमें यह प्रावधान किया गया कि आदिवासी की जमीन कोई आदिवासी ही खरीद सकता है. क्रेता एवं विक्रेता का निवास एक ही थाने के अंतर्गत होना चाहिए. आज भी इन शर्तों को पूरा करने के बाद ही झारखंड में आदिवासी जमीन का हस्तांतरण करने का प्रावधान है. संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम जब 1949 में पारित किया गया तो 1900 के बंदोबस्ती नियम के इस शर्त को धारा 20 मे जगह दी गई जो आज भी लागू है.

हूल क्रांति प्रभावशाली विद्रोह था
1857 के सिपाही विद्रोह को याद करें तो इसे ही भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम का पहला विद्रोह माना जाता है, लेकिन आदिवासियों का हूल विद्रोह भी प्रभावशाली विद्रोह रहा. संथाल विद्रोह आदिवासियों के द्वारा शुरू किया गया था जो धीरे-धीरे जन आंदोलन बन गया. तब संथाल विद्रोहियों ने अपने परंपरागत हथियारों के दम पर ही ब्रिटिश सेना के छक्‍के छुड़ा दिए थे. 1855 के संथाल विद्रोह में 50000 से अधिक लोगों ने करो या मरो और अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो का नारा बुलंद किया था.

हूल क्रांति जनवरी 1856  में समाप्त हुआ, तब संथाल परगना का निर्माण हुआ जिसका मुख्यालय दुमका बना. इस महान क्रांति के बाद वर्ष 1900 मे मैक पेरहांस कमेटी ने आदिवासियों के लिए बंदोबस्त अधिनियम बनाया. जिसमें यह प्रावधान किया गया कि आदिवासी की जमीन कोई आदिवासी ही खरीद सकता है. क्रेता एवं विक्रेता   का निवास एक ही थाने के अंतर्गत होना चाहिए. आज भी इन शर्तों को पूरा करने के बाद ही झारखंड में आदिवासी जमीन का हस्तांतरण करने का प्रावधान है. संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम जब 1949 में पारित किया गया तो 1900 के बंदोबस्ती नियम के इस शर्त को धारा 20 मे जगह दी गई जो आज भी लागू है.

प्रभावशाली विद्रोह था हूल क्रांति
1857 के सिपाही विद्रोह को याद करें तो इसे ही भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम का पहला विद्रोह माना जाता है, लेकिन आदिवासियों का हूल विद्रोह भी प्रभावशाली विद्रोह रहा. संथाल विद्रोह आदिवासियों के द्वारा शुरू किया गया था जो धीरे-धीरे जन आंदोलन बन गया. तब संथाल विद्रोहियों ने अपने परंपरागत हथियारों के दम पर ही ब्रिटिश सेना के छक्‍के छुड़ा दिए थे. 1855 के संथाल विद्रोह में 50000 से अधिक लोगों ने करो या मरो और अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो का नारा बुलंद किया था.

हूल क्रांति से जन्‍मा संथाल परगना

हूल क्रांति से पहले संथाल परगना के नाम से जाना जाने वाला क्षेत्र बंगाल प्रेसिडेंसी के अंदर आता था. यह क्षेत्र काफी दुर्गम-दुरुह था, जहां पहाड़ों-जंगलों के कारण दिन में भी आना-जाना मुश्किल था. पहाड़ की तलहटी में रहने वाले पहाड़िया समुदाय के लोग तब जंगल झाड़‍ियों को काटकर खेती योग्य बनाते और उस पर अपना  स्वामित्व समझते थे. ये लोग अपनी जमीन का राजस्व किसी को नहीं देते थे. इधर इस्ट इंडिया कंपनी के जमींदार जबरन लगान वसूली करते. पहाड़िया लोगों को लगान चुकाने के लिए साहुकार से कर्ज लेना पड़ता था. इस कदर अत्याचार बढ़ गया कि आखिरकार आदिवासियों ने विद्रोह का बिगुल फूंक ही दिया.

इस इलाके में रहने वाले आदिवासी समुदाय के लोगों को संथाल के नाम से जाना जाता है. संथालियों में बोंगा देवता की पूजा की जाती है जिनके हाथ में बीस अंगुलियां होती  हैं. इस देवता के कहने पर ही भोगनाडीह गांव के चुन्नी मांडी के चार बेटों सिद्धो, कान्हो, चांद और भैरव ने मालगुजारी और चौतरफा अत्याचार के खिलाफ 30 जून 1855 को समस्त संथाल में डुगडुगी पीटकर विद्रोह का एलान कर दिया था.

Share this:

  • Click to share on Facebook (Opens in new window)
  • Click to share on X (Opens in new window)

Like this:

Like Loading...

Related

Previous Post

जम्मू-कश्मीर में 4.0 तीव्रता से आया भूकंप, सहमे लोग

Next Post

बीजेपी कहती है ‘मेक इन इंडिया’, लेकिन करती है ‘बाय फ्रॉम चाइना’: राहुल गांधी

Next Post
बीजेपी कहती है ‘मेक इन इंडिया’, लेकिन करती है ‘बाय फ्रॉम चाइना’: राहुल गांधी

बीजेपी कहती है 'मेक इन इंडिया', लेकिन करती है 'बाय फ्रॉम चाइना': राहुल गांधी

  • Privacy Policy
  • Admin
  • Advertise with Us
  • Contact Us

© 2025 BNNBHARAT

No Result
View All Result
  • समाचार
  • झारखंड
  • बिहार
  • राष्ट्रीय
  • अंतर्राष्ट्रीय
  • औषधि
  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी करेंट अफेयर्स
  • स्वास्थ्य

© 2025 BNNBHARAT

%d