बच्चों और युवतियों की तस्करी के लिए झारखंड पूरे देश में बना हब
रांची: वैश्विक महामारी कोरोना वायरस कोविड-19 संक्रमण काल में जब देशभर के विभिन्न हिस्सों से प्रवासी श्रमिकों की घर वापसी का सिलसिला प्रारंभ हुआ, तो झारखंड सरकार को यह जानकारी मिली कि राज्य से सात लाख से अधिक लोगों का पलायन हुआ है, परंतु श्रमिकों के पलायन से अलग मानव तस्करी के लिए राज्य से बाहर ले गये उन छोटे-छोटे बच्चों और युवतियों की खोज-खबर अब तक अधूरी है.
मानव तस्करी एक ऐसा अपराध है, जिसमें लोगों को उनके शोषण के लिये खरीदा और बेचा जाता है. झारखंड के आदिवासी बाहुल इलाकों से छोटे बच्चों और युवतियों को सिर्फ घरेलू कामकाज के लिए बड़े शहरों और दूसरे राज्यों में नहीं ले जाया जाता, बल्कि हाल के दिनों में कई ऐसे मामले में भी यह सामने आये हैं, जिसमें इन युवतियों को सब्जबाग दिखाकर सेक्स रैकेट के धंधे में धकेल देने और मानव अंग की तस्करी के लिए भी बेच दिये जाने की बात भी सामने आयी है.
पूरे देश भर में युवतियों के मानव तस्करी के लिए झारखंड का यह हिस्सा हब बनकर उभरा है. सैकड़ों ऐसे मामले भी सामने आ रहे हैं हरियाणा और पंजाब में जहां बच्चियों का लिंगानुपात कम है, उन राज्यों में शादी के लिए झारखंड से बच्चियों को तस्करी कर ले जाया जा रहा है. जानकार यह भी बताते है कि बच्चियों की संख्या कम होने के कारण पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों के कुछ परिवारों में एक युवती कई पुरुषों के साथ रहने के लिए मजबूर हैं.
मानव तस्करों के कामकाज और हाल के दिनों में एक दर्जन मानव तस्करों को गिरफ्तार कर चार दर्जन से अधिक बच्चियों को मुक्त कराने में अहम भूमिका निभाने वाले रांची रेल मंडल के मंडल सुरक्षा आयुक्त प्रशांत यादव ने बताया कि मानव तस्करी में गांव की कुछ महिलाओं की ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जिसमें कुछ पुरुषों का सहयोग होता है. ये महिलाएं पहले अपने गांव की बच्चियों को बड़े शहरों के चकाचौंध जिंदगी, मोबाइल, जींस और एशोआराम की जिंदगी के बारे में बताती है और यह भी समझाती है कि वे भी शहरों में जाकर इन सुख-सुविधा का आनंद ले सकती हैं.
दुनियादारी से दूर बच्चियों के दिगाम में एक बार यह बात आ जाती है, तो फिर वह अपने परिवार में दबाव बनाने लगती है और फिर जिद्द के आगे परिवार वाले भी उन्हें बाहर जाने की अनुमति दे देते हैं. परंतु एक बार जब ऐसी बच्चियां गांव के बाहर निकलती है, तो फिर उनके अपने हाथ में कुछ नहीं रह जाता. वे दलाल और परिस्थितियों पर निर्भर हो जाती है. शहरों में जहां उनका शारीरिक और मानसिक शोषण आम बात है, वहीं देखने में ठीक रहने वाली कुछ युवतियां को जबरन सेक्स रैकेट के धंधे में उतार दिया जाता है.
प्रशांत यादव ने बताया कि हाल के दिनों में कई ऐसे मामले भी सामने आये है, जिसमें मानव तस्कर बच्चों को बाहर ले जाने के पहले उनका ब्लड टेस्ट और अन्य जांच यह कह कर कराते है कि उन्हें कोई बीमारी तो नहीं हैं. बाद में उनके सैंपल का मिलान अंग तस्करी के लिए किया जाता है और यदि अंग तस्करी के लिए वह उपयुक्त होता है, तो तस्कर उन बच्चों के अभिभावकों को अग्रिम राशि देकर ही उनके जिगर के टुकड़ों को अपने साथ ले जाते है. फिर उनके अंग को बेच दिया जाता है, बाद में उनके परिजन को सूचना मिलती है कि उनके बच्चे की मौत हो गयी या कोई अंग खराब हो गया.
मंडल सुरक्षा आयुक्त ने बताया कि दक्षिण पूर्व रेलवे की ओर से पॉयलट प्रोजेक्ट के तहत रांची रेल मंडल में मानव तस्करी पर अंकुश लगाने के लिए ‘‘नन्हे फरिश्ते’’ नामक एक विशेष पहल की शुरुआत की गयी है. जिसके तहत रांची, हटिया और मुरी स्टेशन पर सिविल ड्रेस में तैनात महिला पुलिसकर्मी मानव तस्करी के लिए बाहर ले जाने वाले युवतियों और बच्चियों पर कड़ी नजर रखती हैं. उन्होंने बताया कि पिछले कुछ दिनों में ऐसे एक दर्जन मानव तस्करों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि करीब चार दर्जन बच्चों और युवतियों को इन तस्करों से मुक्त करा कर एनजीओ और उनके परिवार को वापस सौंप दिया गया हैं.
हटिया, रांची और मुरी रेलवे स्टेशन पर अपने दो सहयोगियों आशा टोप्पो तथा सबिता के साथ मिलकर बाहर जाने वाली प्रत्येक ट्रेन पर नजर रखे वाली रेल पुलिस बल की एसआई सुनीता तिर्की ने बताया कि मानव तस्कर जब किसी बच्ची को अपने साथ लेकर जाते है, तो उसे अपनी बहन या परिवार का सदस्य बनाते हैं, लेकिन पहली बार स्टेशन पहुंची गांव की बच्चियों के आंखों को देखकर यह सहज अनुमान लगाया जाता है कि वे पहली बार किसी बड़े शहर को जाने वाली हैं.
इन बच्चियों से जब पूछताछ की जाती है, तो प्रारंभ में वह बताती है कि वे किसी बड़े शहर में घूमने के लिए जा रही हैं, वह एसी-2 या एसी-1 कोच में सफर करती है, जो उनकी आर्थिक परिस्थितियों से मेल नहीं खाती है, कड़ाई से पूछताछ करने पर वह स्वीकार करती है कि वह किस मकसद से दूसरे राज्यों में ले जाया जा रहा हैं. इस कार्य में प्लेसमेंट एजेंसियां और दलाल की मिलीभगत पर नजर रखने के लिए इंटेलिजेंस की भी मदद ली जाती हैं.
रेल पुलिस की ओर से सिर्फ मानव तस्करी पर अंकुश के लिए ही नहीं, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भी ‘सहेली’ नामक एक टीम का गठन किया गया है, इस टीम में शामिल महिला पुलिस पदाधिकारियों और कर्मियों द्वारा अकेले सफर कर रही महिलाओं से बातचीत कर उन्हें हेल्पलाइन नंबर और सुविधाओं के बारे में जानकारी दी जाती हैं.
मंडल सुरक्षा आयुक्त प्रशांत मंडल ने बताया कि सहेली टीम के सदस्यों द्वारा हाल के दिनों में महिला यात्रियों के लिए कई ऐसे काम किये गये है, जिसकी काफी सराहना हुई. टीम के सदस्यों ने एक प्रसव पीड़ा से परेशान महिला यात्री को बीच रास्ते में उतार अस्पताल में भर्ती कराया और कुछ ही घंटे में उसने एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया. जबकि श्रमिक स्पेशल ट्रेन में भूख से बिखलते एक नवजात को अपने घर से लाकर गर्म दूध उपलब्ध कराया गया. इसके अलावा कई अन्य महिला यात्रियों को अलग-अलग तरीके से सहायता उपलब्ध करायी गयी.
सहेली टीम का कमान संभालने वाली एसआई सुनीता पन्ना ने बताया कि रांची स्टेशन से खुलने वाली हर ट्रेन की महिला यात्रियों से बातचीत कर उन्हें हेल्पलाइन नंबर और एक मोबाइल नंबर के बारे में जानकारी दी जाती है, ताकि किसी भी मुश्किल खड़ी में उन्हें तत्काल सहायता उपलब्ध करायी जा सके. अब महिला यात्री भी काफी जागरूक होने लगी है और कुछ भी परेशानी होने पर वह हेल्पलाइन नंबर पर कॉल करती हैं.

