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रैयतों की शर्त मानने से डीसी-एसपी ने किया इनकार तो कैसे डीएसपी-दारोगा हो गए तैयार?

by bnnbharat.com
October 10, 2020
in समाचार
कोल ट्रांसपोर्टिंग को लेकर कराए जा रहे सड़क निर्माण के विरुद्ध ग्रामीण हुए गोलबंद
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एनटीपीसी को माईनिंग न करने की शर्त रखे थे आंदोलकारी

जनप्रतिनिधि के कारण बिगड़े हालात, उठ रहे सवाल

हजारीबाग: हजारीबाग में एनटीपीसी के पंकरी बरवाडीह कोल प्रॉजेक्ट एरिया में अपनी मांगों को लेकर पिछले डेढ़ महीने से आंदोलन कर रहे रैयतों की मांगों को कोई सकारात्मक हल किए बिना चार जिलों के भारी पुलिसबल लगाकर एनटीपीसी में डंप कोयले का परिवहन चालू करवा दिया गया. 

एनटीपीसी द्वारा साढ़े पांच लाख टन डंप कोयले में आग लगने और संभावित खतरे को देखते हुए सरकार से अपील की गई थी. जिले के आपदा-प्रबंधन कमिटी के अधिकारियों डीसी-एसपी की तरफ से संभावित खतरे को टालने के लिए डंप कोयले का उठाव शुरू कराया गया. आंदोलन कर रहे लोगों ने कोयले उठाव की शर्तों को मना किया, लेकिन शर्त रख दिया कि सिर्फ जमा कोयले का उठाव होगा, खनन नहीं होगा.

डीसी-एसपी ने कहा कि मेरा काम आपदा प्रबंधन का है, खनन चालू करने या बंद रखने का काम सरकार और कंपनी के अधिकार क्षेत्र में आता है. यह कहकर अधिकारियों ने कोई भी शर्त को मानने से इनकार कर दिया.

बाद में हल्के विरोध के बावजूद सदर डीएसपी, सदर डीएसपी (पीसीआर) बड़कागांव बीडीओ-सीओ, थाना प्रभारी, केरेडारी थाना प्रभारी आदि ने ग्रामीणों को लिखित आश्वाशन दे दिया कि भयंकर आपदा टालने के लिए जमा कोयले का उठाव किया जा रहा है.

जमा कोयले को हटाने के बाद कंपनी द्वारा किसी भी प्रकार का माइनिंग तब तक नहीं किया जाएगा, जब तक कंपनी ग्रामीणों के जायज मांगों को मान नहीं लेती. तब तक किसी भी प्रकार की माइनिंग का आदेश जिला प्रशासन के तरफ से नहीं दी जाएगी.

सवाल यह उठता है कि जिस पेपर पर यह हस्ताक्षर किया गया है और जिस शर्त को माना गया है, क्या उसके अधिकृत या सक्षम अधिकार उनके पास था? उसमें जिले के वरीय अधिकारियों के सिग्नेचर नहीं है. सिर्फ एसडीपीओ स्तर के अधिकारियों ने ही सिग्नेचर किया है, उसमें भी इस शर्त की अवधि मात्र पंद्रह दिन की है. पंद्रह दिन बाद अगर माइनिंग चालू होता है, तो इस लिखित शर्त का कोई महत्व नहीं रह जाएगा.

जनप्रतिनिधि के कारण बिगड़े हालात, गुटों में बंटा आंदोलन

एनटीपीसी के खिलाफ वर्षों से चल रहे आंदोलन में यूपीए सरकार बनते ही एक उम्मीद जगी थी कि यहां के रैयतों की सुनी जाएगी. लेकिन जैसा बताया जाता है कि एक जनप्रतिनिधि के कारण यहां के रैयतों की समस्या हल होने के बजाय उलझ कर रह गया है.

शुरुआत में जनप्रतिनिधि ने लोगों को यह आश्वस्त कर दिया कि सरकार हमारी हम जो चाहेंगे वही होगा. रोजगार के नाम पर उकसा कर आंदोलन कर कंपनी का काम बंद करवा दिया गया. हजारों रिज्यूम जमा करवा कर लोगों को नौकरी दिलाने का झांसा दिया गया, फिर यह कहकर मुकर गए कि नौकरी जिला प्रशासनिक और कंपनी की कमिटी देगी. समय लेकर आंदोलन स्थगित किया गया. उसके बाद नया आश्वासन दिया गया की मुआवजा राशि साठ लाख दिलवा देंगे.

सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय कमिटी में कंपनी ने भूमि अधिग्रहण कानून 2013 मानने से इनकार कर दिया. उसके लिए उसने कुछ गाइडलाइन का सहारा लिया, लेकिन जनप्रतिनिधि ने ऐसा कोई साक्ष्य या आधार पस्तुत नहीं किया, जिससे कमिटी और कंपनी मुआवजा बढ़ाने पर सहमत हो सके.

जनप्रतिनिधि के संदिग्ध गतिविधि को भांपते हुए आंदोलकारी कई गुट में बंट गए. 20 अलग-अलग जगहों में धरना का कार्यक्रम चालू हो गया. जिससे हालात और बिगड़ गए. गंभीर आपदा को देखते हुए भारी पुलिसबल तैनात कर जमा कोयले का उठाव शुरू कर दिया गया.

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