रांची: विद्यामार्तण्ड परीक्षित मंडल ‘ प्रेमी विद्यावारिधि , साहित्यमार्तण्ड , वेदमार्तण्ड , साहित्यवाचस्पति विभिन्न प्रकार के ऐतिहासिक अनुसंधानों , पुरातात्त्विक गवेषणाओं तथा भाषा वैज्ञानिक सर्वेक्षणों से यह प्रमाणित हो चुका है कि भारतीय मानक अंक संकेतों का अंतर्राष्ट्रीय मानक स्वरूप 0.1,2,3,4,5,6,7,8,9 अंक भारतीय मनीषा का श्रेष्ठतम विकास है , जिस प्रकार संसार की 2796 भाषाओं में वैदिक संस्कृत भाषा अपना विशिष्ठ स्थान रखती है.
उसी प्रकार भारतीय अंतर्राष्ट्रीय मानक अंक संकेतों का भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से अपना विशिष्ठ स्थान रहा है . इसका उद्भव और विकास बिलकुल सुनिश्चित भाषा वैज्ञानिक प्रणाली से हुआ है , जैसे किसी मर्मज्ञ सुर – शिल्पी ने भारतीय मानक अंक संकेतों का निर्माण बहुत ही सोच – समझ कर किया हो , यह भारतीय मानक अंक संकेत किसी यूरोपीय अंकों की प्रतिलिपि बिलकुल नहीं है , वरन् स्वयं एक विकसित , व्यवस्थित और परिमार्जित अंक संकेत है .
यह भारतीय मानक अंक संकेत भारत में ही नहीं , बल्कि भारत से चलकर समस्त यूरोपीय देशों में भी पश्चिम की ओर पहुँचा और एशिया महाद्वीप के अनेक भूखंडों में भी . इसी भारतीय मानक अंक संकेतों से विश्व के समस्त भूभाग के अंक संकेत और भारत के अन्य लिपियों के अंक संकेत विकसित तथा परिवर्द्धित होकर सर्वत्र अठखेलियां करते रहे हैं . ब्राह्मी लिपि से ही नागरी ( 8 वीं – नवीं सदी ) , बंगला ( 10 वीं सदी ) , तमिल , असमिया , मैथिली , नेवारी , राजस्थानी , गुजराती आदि भारतीय लिपियाँ निकली हैं . इसी प्रकार ब्राह्मीवंश की विदेशी लिपियाँ सिंहली , माल्दीवी , सीरोमालावारी , बर्मी , स्यामी आदि अन्य लिपियां भी विकसित हुई हैं .
इतिहास गवाह है कि यह अंक संकेत ईसा की आठवीं – नवीं सदी में पूरब में जावा , सुमात्रा , कंबोडिया और पश्चिम में स्पेन तक फैल चुका था . इससे स्पष्ट होता है कि संसार के चार सौ अंक संकेतों में यह सबसे प्राचीनतम मानक अंक संकेत है . इस प्रकार भारतीय मानक अंक संकेत ही किसी – न – किसी रूप में पूरे संसार में लेखन के लिए प्रचलित तथा प्रसारित रहा है . इसकी अपनी आकृति और प्रकृति है . इसमें अंक संकेतों का क्रम पूर्णरूपेण भाषा वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है . इसने किसी अन्य प्रतीच्य देशीय लैटिन , ग्रीक , हिब्रू , फ्रेंच आदि भाषाओं के अंक संकेतों का अंधानुकरण नहीं किया .
एतदर्थ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 ( 1 ) में राष्ट्रभाषा हिंदी के लिए जिन मानक अंक संकेतों को स्वीकार किया गया है , उन्हें भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय मानक स्वरूप कहा गया है . भारत की परंपरागत मान्यता के अनुसार इन अंक संकेतों के आदि आविष्कर्ता ब्रह्मा थे . नारदस्मृति के अनुसार यदि ब्रह्मा ने लेखन कला का आविष्कार नहीं किया होता , तो यह संसार अभी तक आज की जैसी सुव्यवस्थित स्थिति में नहीं होती . ” नाकरिष्यद् यदि ब्रह्मा लिखितं चक्षुरूत्तमम् . तत्रेयमस्य लोकस्य नाभविष्यत् शुभा गतिः .. ” इससे स्पष्ट होता है कि ब्रह्मा ने पुराकाल में ही पत्रों पर रेखांकित किए जा सकने वाले अक्षरों तथा अंकों का निर्माण किया .
इन विवेचनों से स्पष्ट होता है कि 0.1.2.3.4.5.6.7.8,9 मानक अंक संकेतों का आविष्कार सर्वप्रथम भारत में ही हुआ था . ब्राह्मीलिपि का परिचय देते हुए महामहोपाध्याय पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अपनी पुस्तक ‘ प्राचीन भारतीय लिपिमाला ‘ पृष्ठ 7 में लिखा है कि मनुष्य की बुद्धि के सबसे बड़े महत्त्व के दो कार्य भारतीय ब्राह्मीलिपि ‘ और वर्तमान शैली के अंकों की परिकल्पना है . पुनः पाश्चात्य पुरातत्त्ववेत्ता कनिंघम ‘ कंवाइंस ऑफ मिडिएवल इंडिया ‘ पृष्ठ 52 में स्पष्ट लिखा है कि ब्राह्मीलिपि भारतवासियों की निर्माण की हुई स्वतंत्र लिपि है . प्रतीच्य भाषा शास्त्री प्रो ० लासन का मत भी इसी प्रकार का है . इन पुष्कल प्रमाणों के बाद भी इधर कुछ लोग ब्राह्मीलिपि को अंगरेजी या लैटिन अंक संकेत कहने लगे हैं , किन्तु ये नाम बिलकुल भ्रामक , वेबुनियाद और संदिग्ध हैं .
आज सारी दुनिया में जिस भारतीय मानक अंक संकेत का लेखन में प्रचलन है , वह भारतीय मनीषा की श्रेष्ठतम खोज है . अंक विज्ञान के मर्मज्ञ मनीषी गुणाकर मुले ने अपनी पुस्तक ‘ भारतीय इतिहास में विज्ञान ‘ में स्पष्ट लिखा है- ” यूरोप , अमेरिका आदि महाद्वीपों में प्रचलित 0.1.2.3.4.5.6.7.8.9 अंक संकेत भी भारतीय मूल के हैं , प्राचीन ब्राह्मी अंकों से विकसित हुए अंक हैं . अंगरेजों के साथ ये अंक पुनः भारत में आए . यूरोपीय लोग इन्हें अरबी अंक कहते हैं . पर ये अरबी अंक नहीं हैं . अरबी अंक भिन्न किस्म के हैं . यूरोप के कुछ लोग इन्हें ‘ इंडोअरेबिक अंक ‘ भी कहते है . यथार्थ में ये विशुद्ध भारतीय मूल के मानक अंक हैं . अरबों ने इन्हें ‘ हिंद के गुबार अंक ‘ कहा था और आरंभ में यूरोप के पंडितों ने भी इन्हें ‘ हिंद के अंक ‘ ( न्यू मेरो इंदोरम ) ही कहा है . अतः आज सारी दुनिया में प्रचलित मानक अंक संकेत भारत की ही खोज है . अंक विज्ञान के क्षेत्र में संसार को यह भारत की सबसे बड़ी देन है . ” अतः हम विश्वासपूर्वक यह बात कह सकते हैं कि यह मानक अंक संकेत किसी विदेशी अंक संकेतों से उत्पन्न .
भारतीय मूल या परिवर्द्धित रूप बिलकुल नहीं है , बल्कि यह मानक अंक संकेत मूलरूप से भारतीय मूल के हैं . भारतीय भाषा , साहित्य एवं इतिहास के अधिकांश विदेशी अध्येताओं , पुरातत्त्ववेत्ताओं और भाषा शास्त्रियों में डा ० हुल्श , डा ० फ्लीट , एडवर्ड थॉमस , प्रो ० डउसन , जेनरल कनिंघम और प्रो ० लासन ने स्पष्ट कहा है कि ये मानक अंक संकेत भारतीयों का खोज किया हुआ अपना मौलिक आविष्कार है .
इसका व्यवहार हमारे प्राचीन ऋषियों – मुनियों , मनीषियों और कवियों ने प्राचीनकाल से अर्वाचीनकाल तक लेखन में विचार – विनिमय के लिए व्यवहृत किया है तथा आज भी देश की भावात्मक एकता एवं अखंडता के लिए सतत व्यवहार करते आ रहे हैं . इतना ही नहीं , आज यूरोप में रोमन अंकों के स्थान पर 0.1.2.3.4.5.6.7.8.9 का लेखन में प्रयोग करते हैं . गणित के इतिहासकार प्रो ० अल्फ्रेड हूपर ने लिखा है ” अरबों ने ही सबसे पहले स्पेन में भारतीय अंक संकेत का प्रचार किया . यह एक नयी और क्रांतिकारी अंक पद्धति थी . इसी अंक संकेत में आधुनिक विज्ञान और इंजीनियरी का पथ प्रशस्त किया है .
आधुनिक युग के बुद्धिवादी मनुष्यों ने भी मुक्त कंठ से यह स्वीकार किया है कि यह अंक संकेत भारतीय मनीषा की अपनी खोज से उत्पन्न किया हुआ गहनतम मौलिक आविष्कार है . किसी पाश्चात्य अंक संकेत की भोंड़ी नकल कतई नहीं है . पुनः फ्रांसीसी गणितज्ञ पीयरे सिमॉन लाप्लास ( 1749-1827 ई ० ) ने लिखा है- ” केवल दश संकेतों से संख्याओं को व्यक्त करने की यह अद्भुत विधि हमें भारत से ही प्राप्त हुई है . इसमें प्रत्येक संकेत का एक निजी मान के अलावा भिन्न – भिन्न स्थानमान भी होते हैं ….. गणनाओं को सुगम बनाने की इसकी क्षमता हमारे अंकगणित को प्रथम श्रेणी का उपयोगी आविष्कार बना देती है .
” यूरोप के महान खगोलविद निकोलस कोपर्निकस . ( 1473-1543 ई ० ) ने भी भारतीय अंक संकेत की श्रेष्ठता को स्वीकार करते हुए के अंक संकेतों को ‘ इंडिके न्यूमरोरम फिगुरे ( भारत के अंक संकेत ) कहा है . ” पुनः भारतीय पुरालिपिविद गुणाकर मुले ने अपनी पुस्तक “ भारतीय इतिहास में विज्ञान ” में लिखा है- ” अरबों के विद्वान इन भारतीय अंकों को ” हिंदिसा अलअरकाम अलहिंदी ( हिंदी के अंक ) ” या ‘ हरूफ़ अलगुबार ‘ कहते थे . अतः यह कहा जा सकता है कि आज सारी दुनिया में प्रचलित अंक संकेत भारतीय मूल के ही अंक संकेत हैं . भारतीय मूल के इन गुबार अंकों का पहले पश्चिमी एशिया में और बाद में यूरोप के देशों में महान इस्लामी गणितज्ञ मुहम्मद अलखुवारिज्मी ( 783 – लगभग 850 ई ० ) ने इस्तेमाल किया था . इस प्रकार भारत से हिंसे पहले अरब और अरबों से यूरोप ने लिये .
इसी प्रकार शून्य का विचार भी भारत से अरब तथा यूरोप में पहुँचा . भारत का शून्य अरब में सीफर ‘ हो गया वहाँ से लैटिन में ‘ जेफिरम ‘ और अंगरेजी में ‘ जीरो ‘ हुआ . तभी तो लैटिन और पश्चिमी विश्व अंकों को हिंदू अरेबिक या ! इंडो – अरेबिक न्यूमरल ही कहता है . फ्रांस के विश्वविख्यात गणितज्ञ पीयरे सिमॉन लाप्लास ने लिखा है- “ वह देश भारत ही है , जिसने हमें दश प्रतीकों के माध्यम से सभी संख्याएँ प्रकट करने की मौलिक पद्धति दी .
इनमें से प्रत्येक मानक अंक न केवल अपनी स्थिति के अनुसार मूल्य प्राप्त करता है , बल्कि उसका निरपेक्ष मूल्य भी होता है और इसने हर प्रकार की गणनाओं को अद्भुत सरलता प्रदान कर दी है . ” इस प्रकार भारत ही वह देश है , जिसने दुनिया को शून्ययुक्त दाशमिक स्थानमान अंक दी . आज पूरे विश्व में शून्य तथा दाशमिक स्थानमान प्रणाली का महत्त्व इसी बात से परिलक्षित होता है कि यह पद्धति पूरे विश्व में प्रचलित है तथा इसी के आविष्कार ने गणित तथा विज्ञान को उन्नत शिखर तक पहुंचाया है .
मनुष्य द्वारा किए गए आविष्कारों में वर्णमाला की खोज के बाद इस शून्य का आविष्कार सबसे अधिक महत्त्व पूर्ण है . लगभग 200 ई ० पूर्व महर्षि पिंगलाचार्य की पुस्तक ” छन्दशास्त्र ” में सबसे पहली बार शून्य पर चर्चा का दृष्टांत मौजूद है . इस पुस्तक में शून्य का जो संकेत मिलता है , वह पूर्णतया आधुनिक शून्य के सिद्धांतों पर आधारित है . निष्कर्ष यह है कि भारतीय मानक अंक संकेत संसार भर की अंक संकेतों में सर्वश्रेष्ठ है . हमारा यह मानक अंक संकेत समस्त यूरोपीय अंक संकेतों से प्राचीनता , व्यापकता और अभिरामता में सरल , संबोध , सुव्यवस्थित एवं गुणवत्ता से भी संपन्न है . यदि इस सार्वभौम भूमि वलय पर कोई भी अंक संकेत सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक होने की . अधिकारिणी है , तो वह निर्विवाद रूप से हमारे मानक अंक संकेत ही है .
भारत के प्राचीन उत्कीर्ण अभिलेख गुहालेख , शिलालेख , स्तंभलेख और ताम्रपत्र ब्राहीलिपि में सम्राट अशोक ( ईसा पूर्व तीसरी सदी ) के सभी अभिलेख इसी मानक अंक संकेतों में उपलब्ध हैं तथा इनके साथ ही कतिपय शिलालेख आदि खरोष्टी लिपि में भी पाए गए हैं . पर यह निर्विवाद सत्य है कि भारतीय मानक अंक संकेतों को अंतर्राष्ट्रीय मानक स्वरूप तक पहुँचने में उसे कियत् परिष्कार , संशोधन और संतुलित समन्वय की अनेक विवेक संगत तथा सर्वतोमुखी स्थितियों से गुजरना पड़ा है . जो भी हो , राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए यह एक अमूल्य धरोहर तथा अभूतपूर्व उपहार है .
हिंदी अध्यापक , संत फ्रांसिस उच्च विद्यालय , पोडैयाहाट , जिला- गोड्डा 814133

