रांची:- आजादी के 75 वीं वर्षगांठ के पूर्व दिवसों पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की कड़ी में आज “आजादी का अमृत महोत्सव – एक भारत श्रेष्ठ भारत के संदर्भ में“ पत्र सूचना कार्यालय, प्रादेशिक लोक संपर्क ब्यूरो, रांची और क्षेत्रीय लोक संपर्क ब्यूरो, दुमका ; गोवा यूनिवर्सिटी, गोवा व रामगढ़ कॉलेज , रामगढ़ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित वेबिनार के दौरान पत्र सूचना कार्यालय के अपर महानिदेशक अरिमर्दन सिंह ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा की आजादी के 74 साल के बाद आज की पीढ़ी को यह बताना बहुत प्रासंगिक है की महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाए गए आजादी के आंदोलन में आजादी के नायकों का क्या रोल रहा और उन्होंने किस प्रकार त्याग और समर्पण का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हुए आजादी के लिए लगातार प्रयत्नशील रहे. जिस समय आजादी के मतवाले विदेशी शासन के खिलाफ एकजुट होकर आजादी के लिए प्रयासरत थे उस समय उन्हें भी यह मालूम नहीं था कि उनकी संघर्ष का परिणाम क्या होगा.
अनंतः हमें आजादी प्राप्त हुई और यह आजादी के मतवालों के बलिदान और अनथक प्रयास का नतीजा है कि हम भारतवासी आजाद भारत में सांस ले रहे हैं.
यह आजादी बहुत बहुमूल्य है और इससे हमें संभाल कर रखना है.
अपर महानिदेशक श्री अरिमर्दन सिंह ने आगे कहा कि आज़ादी के लिए यह प्रयास समस्त भारत से किया गया प्रयास था जो एक प्रकार से एक भारत, श्रेष्ठ भारत की परिकल्पना को सच करता है.
वेबिनार को संबोधित करते हुए गोवा यूनिवर्सिटी की इतिहास विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉक्टर सीमा रिशबुद ने कहा कि गोवा वासी एक लंबे समय तक पुर्तगालियों के अधीन रहे लेकिन अधिकतर गोवा वासियों की हमेशा से ही अभिलाषा थी कि वे भारत के जनतंत्र का हिस्सा बनकर अपने राज्य को प्रगति की ओर ले जाएं. गोवा वासियों का यह सपना पूरा हुआ और आज गोवा भारत का एक महत्वपूर्ण राज्य है और गोवा वासी लगातार प्रगति की नई मंजिलों को छू रहे हैं.
रांची विश्वविद्यालय की शोधार्थी अर्मा मंजर ने वेबीनार में बहुत विस्तार से एक भारत, श्रेष्ठ भारत की प्रतिलिपना पर प्रकाश डाला और उन्होंने बताया कि किस प्रकार प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सामान खानपान वाराणसी वाले राज्यों का जोड़ा बनाकर उन्हें प्रगति के नए आयाम से रूबरू कराया.
श्रीमती अर्मा मंजर ने बताया कि आदिवासी समाज एक हंसता-खेलता , नाचता-गाता समाज होता है जो टिकाऊ विकास पर विश्वास रखता है.
अंतः झारखंड का आदिवासी समाज हो या गोवा का आदिवासी समाज, यह हमारे लिए किसी विश्व धरोहर से कम नहीं है और इन्हें सहेज कर रखना मानव सभ्यता की जिम्मेदारी है.
वेबिनार को संबोधित करते हुए रामगढ़ कॉलेज ,रामगढ़ के प्रिंसिपल डॉक्टर मिथिलेश कुमार सिंह ने बुनियादी तौर पर आदिवासी समाज के लोग आजादी-पसंद प्रवृत्ति के होते हैं और उन्हें स्वच्छंद-उन्मुक्त रहना बहुत भाता है.
झारखंड के इतिहास पर अगर हम नजर डालें तो यहां के आदिवासियों ने ना तो मुस्लिम शासकों के वर्चस्व को बर्दाश्त किया और ना ही बाद में ब्रिटिश शासकों के शासन को बर्दाश्त किया और वह हमेशा आजादी के लिए प्रयत्नशील रहे.
डॉ मिथिलेश ने आगे कहा कि झारखंड के आजादी का इतिहास बहुत संघर्ष पूर्ण इतिहास रहा है. बहुत कम संसाधनों और बहुत कम शिक्षा के साथ झारखंड के आदिवासियों का आजादी का संघर्ष स्वर्णिम अक्षरों में लिखे जाने के काबिल है.
गोवा यूनिवर्सिटी की शोध छात्रा व गणपत परसेकर कॉलेज ऑफ एजुकेशन में सहायक प्रोफ़ेसर के रूप में कार्यरत स्नेहा घाड़ी ने अपनी प्रस्तुति में कहा कि गोवा और झारखंड के इतिहास में कई समानताएं हैं और दोनों के संघर्ष का भी एक जैसा विवरण मिलता है.
श्रीमती स्नेहा ने झारखंड और गोवा के सांस्कृतिक विरासत का भी एक तुलना पेश करते हुए यह बताया कि दोनों राज्यों के लोगों के रहन-सहन और संस्कृति में कई समानताएं पाई जाती हैं.
वेबिनार का समन्वय एवं संचालन क्षेत्रीय प्रचार अधिकारी शाहिद रहमान ने किया. वेबिनार में विशेषज्ञों के अलावा शोधार्थी, छात्र, पीआईबी, आरओबी, एफओबी, दूरदर्शन एवं आकाशवाणी के अधिकारी-कर्मचारियों तथा दूसरे राज्यों के अधिकारी-कर्मचारियों ने भी हिस्सा लिया. गीत एवं नाटक विभाग के अंतर्गत कलाकार एवं सदस्य, आकाशवाणी के पीटीसी, दूरदर्शन के स्ट्रिंगर तथा संपादक और पत्रकार भी शामिल हुए. वेबिनार का यु-ट्यूब पर भी लाइव प्रसारण किया गया.
